ghazal shayari in hindi font 2016



  1. #कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे,
  2. जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

  3. 3उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा, 
  4. यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

  5. #बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो, 
  6. दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

  7. #मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे, 
  8. यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

  9. यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की,
  10. वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
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  12. मैं बुरा ही सही भला न सही,
  13. पर तेरी कौन सी जफ़ा न सही;

  14. दर्द-ए-दिल हम तो उन से कह गुज़रे,
  15. गर उन्हों ने नहीं सुना न सही;

  16. शब-ए-ग़म में बला से शुग़ल तो है,
  17. नाला-ए-दिल मेरा रसा न सही;

  18. दिल भी अपना नहीं रहा न रहे,
  19. ये भी ऐ चर्ख़-ए-फ़ित्ना-ज़ा न सही;

  20. देख तो लेंगे वो अगर आए,
  21. ताक़त-ए-अर्ज़-ए-मुद्दआ न सही;

  22. कुछ तो आशिक़ से छेड़-छाड़ रही;
  23. कज-अदाई सही अदा न सही;

  24. क्यूँ बुरा मानते हो शिकवा मेरा,
  25. चलो बे-जा सही ब-जा न सही;

  26. उक़दा-ए-दिल हमारा या क़िस्मत,
  27. न खुला तुझ से ऐ सबा न सही;

  28. वाइज़ो बंद-ए-ख़ुदा तो है 'ऐश',
  29. हम ने माना वो पारसा न सही।
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  31. आख़िर-ए-शब वो तेरी अँगड़ाई,
  32. कहकशाँ भी फलक पे शरमाई;

  33. आप ने जब तवज्जोह फ़रमाई,
  34. गुलशन-ए-ज़ीस्त में बहार आई;

  35. दास्ताँ जब भी अपनी दोहराई,
  36. ग़म ने की है बड़ी पज़ीराई;

  37. सजदा-रेज़ी को कैसे तर्क करूँ,
  38. है यही वजह-ए-इज़्ज़त-अफ़ज़ाई;

  39. तुम ने अपना नियाज़-मंद कहा,
  40. आज मेरी मुराद बर आई;

  41. आप फ़रमाइए कहाँ जाऊँ,
  42. आप के दर से है शनासाई;

  43. उस की तक़दीर में है वस्ल की शब,
  44. जिस ने बर्दाश्त की है तन्हाई;

  45. रात पहलू में आप थे बे-शक,
  46. रात मुझ को भी ख़ूब नींद आई;

  47. मैं हूँ यूँ इस्म-ब-मुसम्मा 'अज़ीज़',
  48. वारिश-ए-पाक का हूँ शैदाई।
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  50. ये किसने गला घोंट दिया जिन्दादिली का,
  51. चेहरे पे हँसी है कि जनाजा है हँसी का;

  52. हर हुस्न में उस हुस्न की हल्की सी झलक है,
  53. दीदार का हक मुझको है जल्वा हो किसी का;

  54. रक्साँ है कोई हूर कि लहराती है सहबा, 
  55. उड़ना कोई देखे मिरे शीशे की परी का;

  56. जब रात गले मिलके बिछड़ती है सहर से,
  57. याद आता है मंजर तेरी रूखसत की घड़ी का;

  58. उन आँखों के पैमानों से छलकी जो जरा सी,
  59. मैखाने में होश उड़ गया शीशे की परी का;

  60. रूस्वा है 'नजीर' अपने ही बुतखाने की हद में, 
  61. दीवाना अगर है तो बनारस की गली का।
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  63. कभी बहुत है कभी ध्यान तेरा कुछ कम है,
  64. कभी हवा है कभी आँधियों का मौसम है;

  65. अभी न तोड़ा गया मुझ से कै़द-ए-हस्ती को,
  66. अभी शराब-ए-जुनूँ का नशा भी मद्धम है;

  67. कि जैसे साथ तिरे ज़िंदगी गुज़रती हो,
  68. तिरा ख़याल मिरे साथ ऐसे पैहम है;

  69. तमाम फ़िक्र-ए-ज़मान-ओ-मकाँ से छूट गई,
  70. सियाह-कारी-ए-दिल मुझे को ऐसा मरहम है;

  71. मैं ख़ुद मुसाफ़िर-ए-दिल हूँ उसे न रोकुँगी,
  72. वो ख़ुद ठहर न सकेगा जो कै़दी-ए-ग़म है;

  73. वौ शौक़-ए-तेज़-रवी है कि देखता है जहाँ,
  74. ज़मीं पे आग लगी आसमान बरहम है।
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  76. कुछ हिज्र के मौसम ने सताया नहीं इतना,
  77. कुछ हम ने तेरा सोग मनाया नहीं इतना;

  78. कुछ तेरी जुदाई की अज़िय्यत भी कड़ी थी,
  79. कुछ दिल ने भी ग़म तेरा मनाया नहीं इतना;

  80. क्यूँ सब की तरह भीग गई हैं तेरी पलकें,
  81. हम ने तो तुझे हाल सुनाया नहीं इतना;

  82. कुछ रोज़ से दिल ने तेरी राहें नहीं देखीं,
  83. क्या बात है तू याद भी आया नहीं इतना;

  84. क्या जानिए इस बे-सर-ओ-सामानी-ए-दिल ने,
  85. पहले तो कभी हम को रुलाया नहीं इतना।
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  87. अब मेरा दिल कोई मज़हब न मसीहा माँगे,
  88. ये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे;

  89. ऐसी फ़सलों को उगाने की ज़रूरत क्या है,
  90. जो पनपने के लिए ख़ून का दरिया माँगें;

  91. सिर्फ़ ख़ुशियों में ही शामिल है ज़माना सारा,
  92. कौन है वो जो मेरे दर्द का हिस्सा माँगे;

  93. ज़ुल्म है, ज़हर है, नफ़रत है, जुनूँ है हर सू,
  94. ज़िन्दगी मुझसे कोई प्यार का रिश्ता माँगे;

  95. ये तआलुक है कि सौदा है या क्या है आख़र,
  96. लोग हर जश्न पे मेहमान से पैसा माँगें;

  97. कितना लाज़म है मुहब्बत में सलीका ऐ'अज़ीज़',
  98. ये ग़ज़ल जैसा कोई नर्म-सा लहज़ा माँगे।
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  100. और कुछ तेज़ चलीं अब के हवाएँ शायद,
  101. घर बनाने की मिलीं हम को सज़ाएँ शायद;

  102. भर गए ज़ख़्म मसीहाई के मरहम के बग़ैर, 
  103. माँ ने की हैं मिरे जीने की दुआएँ शायद;

  104. मैं ने कल ख़्वाब में ख़ुद अपना लहू देखा है,
  105. टल गईं सर से मिरे सारी बलाएँ शायद;

  106. मैं ने कल जिन को अंधेरों से दिलाई थी नजात,
  107. अब वह लोग मिरे दिल को जलाएँ शायद;

  108. फिर वही सर है वहीं संग-ए-मलामत उस का,
  109. दर-गुज़र कर दीं मिरी उस ने ख़ताएँ शायद;

  110. इस भरोसे पे खिला है मिरा दरवाज़ा 'रईस',
  111. रूठने वाले कभी लौट के आएँ शायद।
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  113. हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए,
  114. इंसान हैं सभी तो मसावात चाहिए;

  115. अच्छा चलो ख़ुदा न सही उन को क्या हुआ ,
  116. आख़िर कोई तो क़ाज़ी-ए-हाजात चाहिए;

  117. है आक़बत ख़राब तो दुनिया ही ठीक हो,
  118. कोई तो सूरत-ए-गुज़र-औक़ात चाहिए;

  119. जाने पलक झपकने में क्या गुल खिलाए वक़्त,
  120. हर दम नज़र ब-सूरत-ए-हालात चाहिए;

  121. आएगी हम को रास न यक-रंगी-ए-ख़ला,
  122. अहल-ए-ज़मीं हैं हम हमें दिन रात चाहिए;

  123. वा कर दिए हैं इल्म ने दरिया-ए-मारिफ़त,
  124. अँधों को अब भी कश्फ़ ओ करामात चाहिए;

  125. जब क़ैस की कहानी अब अंजुम की दास्ताँ,
  126. दुनिया को दिल लगी के लिए बात चाहिए।
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  128. ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए,
  129. वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए;

  130. वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ,
  131. वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए;

  132. है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ,
  133. लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए;

  134. उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी,
  135. सूने हैं कोहसार दिवाने किधर गए;
  136. v वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई,
  137. वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए;

  138. दिन रात मैकदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी,
  139. 'अख़्तर' वो बेख़ुदी के ज़माने किधर गए।

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  141. आँखों ने हाल कह दिया होंठ न फिर हिला सके,
  142. दिल में हज़ार ज़ख्म थे जो न उन्हें दिखा सके;

  143. घर में जो एक चिराग था तुम ने उसे बुझा दिया,
  144. कोई कभी चिराग हम घर में न फिर जला सके;

  145. शिकवा नहीं है अर्ज़ है मुमकिन अगर हो आप से,
  146. दीजे मुझ को ग़म जरूर दिल जो मिरा उठा सके;

  147. वक़्त क़रीब आ गया हाल अजीब हो गया,
  148. ऐसे में तेरा नाम हम फिर भी न लब पे ला सके;

  149. उस ने भुला के आप को नजरों से भी गिरा दिया, 
  150. 'नासिर'-ए-ख़स्ता-हाल फिर क्यों न उसे भुला सके।
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  152. आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी,
  153. आतिश जवान था तो क़यामत लहू की थी;

  154. ज़ख़्मी हुआ बदन तो वतन याद आ गया,
  155. अपनी गिरह में एक रिवायत लहू की थी;

  156. ख़ंजर चला के मुझ पे बहुत ग़म-ज़दा हुआ,
  157. भाई के हर सुलूक में शिद्दत लहू की थी;

  158. कोह-ए-गिराँ के सामने शीशे की क्या बिसात,
  159. अहद-ए-जुनूँ में सारी शरारत लहू की थी;

  160. रूख़्सार ओ चश्म ओ लब गुल ओ सहबा शफ़क़ हिना,
  161. दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में तिजारत लहू की थी;

  162. 'ख़ालिद' हर एक ग़म में बराबर का शरीक था,
  163. सारे जहाँ के बीच रफ़ाकत लहू की थी।
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  165. अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे,
  166. सुब्ह-ए-फ़र्दा की किरन भी न जहाँ तक पहुँचे;

  167. मैं ने आँखों में छुपा रक्खे हैं कुछ और चराग़,
  168. रौशनी सुब्ह की शायद न यहाँ तक पहुँचे;

  169. #बे-कहे बात समझ लो तो मुनासिब होगा,
  170. इस से पहले के यही बात ज़बाँ तक पहुँचे;

  171. #तुम ने हम जैसे मुसाफ़िर भी न देखे होंगे,
  172. जो बहारों से चले और ख़िज़ाँ तक पहुँचे;

  173. #आज पिंदार-ए-तमन्ना का फ़ुसूँ टूट गया;
  174. चंद कम-ज़र्फ़ गिले नोक-ए-ज़बाँ तक पहुँचे।
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  176. #साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं,
  177. मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं; 

  178. एक तस्वीर-ए-मोहब्बत है जवानी गोया, 
  179. #जिस में रंगो की एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं;

  180. इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें,
  181. इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं;

  182. आसमां से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी,
  183. अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं;

  184. शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम "अख्तर" लेकिन,
  185. अच्छे शायर ये सुना है कि जवां मरते हैं।
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  187. न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में खुदा होता,
  188. हमीं से यह तमाशा है, न हम होते तो क्या होता;

  189. न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता,
  190. संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा होता;

  191. घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता,
  192. फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता;

  193. बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से उठवाया,
  194. हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर दिया होता;

  195. तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट गए,
  196. तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ कहा होता।
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  198. एहसास में शिद्दत है वही, कम नहीं होती,
  199. एक उम्र हुई, दिल की लगी कम नही होती;

  200. लगता है कहीं प्यार में थोड़ी-सी कमी थी,
  201. और प्यार में थोड़ी-सी कमी कम नहीं होती;

  202. अक्सर ये मेरा ज़ह्न भी थक जाता है लेकिन,
  203. रफ़्तार ख़यालों की कभी कम नहीं होती;

  204. था ज़ह्र को होंठों से लगाना ही मुनासिब,
  205. वरना ये मेरी तश्नालबी कम नहीं होती;

  206. मैं भी तेरे इक़रार पे फूला न समाता,
  207. तुझको भी मुझे पाके खुशी कम नहीं होती;

  208. फ़ितरत में तो दोनों की बहुत फ़र्क़ है लेकिन,
  209. ताक़त में समंदर से नदी कम नहीं होती।
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  211. बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
  212. मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर;

  213. क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
  214. गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर;

  215. बुज़ुर्गवार ने इसके लिए तो कुछ न कहा,
  216. गए हैं मुझको दुआ-ए-सलामती देकर;

  217. हमारी तल्ख़-नवाई को मौत आ न सकी,
  218. किसी ने देख लिया हमको ज़हर भी देकर;

  219. न रस्मे दोस्ती उठ जाए सारी दुनिया से,
  220. उठा न बज़्म से इल्ज़ामे दुश्मनी देकर;

  221. तिरे सिवा कोई क़ीमत चुका नहीं सकता,
  222. लिया है ग़म तिरा दो नयन की ख़ुशी देकर।
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  224. हर एक शाम का मंज़र धुआँ उगलने लगा,
  225. वो देखो दूर कहीं आसमाँ पिघलने लगा;

  226. तो क्या हुआ जो मयस्सर कोई लिबास नहीं,
  227. पहन के धूप मैं अपने बदन पे चलने लगा;

  228. मैं पिछली रात तो बेचैन हो गया इतना,
  229. कि उस के बाद ये दिल ख़ुद-ब-ख़ुद बहलने लगा;

  230. अजीब ख़्वाब थे शीशे की किर्चियों की तरह,
  231. जब उन को देखा तो आँखों से ख़ूँ निकलने लगा;

  232. बना के दाएरा यादें सिमट के बैठ गईं.
  233. ब-वक़्त-ए-शाम जो दिल का अलाव जलने लगा।
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  235. कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे,
  236. जितनी भी मुश्किल में हूँ आसान कर देगा मुझे;

  237. रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख़ होंठ,
  238. एक दो पल के लिए गुलदान कर देगा मुझे;

  239. रूह फूँकेगा मोहब्बत की मेरे पैकर में वो,
  240. फिर वो अपने सामने बे-जान कर देगा मुझे;

  241. ख़्वाहिशों का ख़ूँ बहाएगा सर-ए-बाज़ार-ए-शौक़,
  242. और मुकम्मल बे-ए-सर-ओ-सामान कर देगा मुझे;

  243. मुनहदिम कर देगा आ कर सारी तामीरात-ए-दिल,
  244. देखते ही देखते वीरान कर देगा मुझे;

  245. या तो मुझ से वो छुड़ा देगा ग़ज़ल-गोई 'ज़फ़र',
  246. या किसी दिन साहब-ए-दीवान कर देगा मुझे।
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  248. निगाहों का मर्कज़ बना जा रहा हूँ;
  249. मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूँ;

  250. मैं क़तरा हूँ लेकिन ब-आग़ोशे-दरिया;
  251. अज़ल से अबद तक बहा जा रहा हूँ;

  252. वही हुस्न जिसके हैं ये सब मज़ाहिर;
  253. उसी हुस्न से हल हुआ जा रहा हूँ;

  254. न जाने कहाँ से न जाने किधर को;
  255. बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूँ;

  256. न सूरत न मआनी न पैदा, न पिन्हाँ
  257. ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूँ।


  258. =================================

  259. बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा,
  260. इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा;

  261. इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश,
  262. फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा;

  263. यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं,
  264. जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा;

  265. काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली,
  266. तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा;

  267. किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर,
  268. वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा।
  269. =================================
  270. हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज्यादा, 
  271. चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज्यादा;

  272. चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है,
  273. एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज्यादा;

  274. जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो,
  275. ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज्यादा;

  276. ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम,
  277. कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज्यादा।
  278. =================================
  279. न आते हमें इसमें तकरार क्या थी,
  280. मगर वादा करते हुए आर क्या थी;

  281. तुम्हारे पयामी ने ख़ुद राज़ खोला,
  282. ख़ता इसमें बन्दे की सरकार क्या थी;

  283. भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा,
  284. तेरी आँख मस्ती में होशियार क्या थी;

  285. तअम्मुल तो था उनको आने में क़ासिद, 
  286. मगर ये बता तर्ज़े-इन्कार क्या थी;

  287. खिंचे ख़ुद-ब-ख़ुद जानिबे-तूर मूसा,
  288. कशिश तेरी ऐ शौक़े-दीदाए क्या थी;

  289. कहीं ज़िक्र रहता है इक़बाल तेरा,
  290. फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी।
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  292. ज़वाले- शब् में किसी की सदा निकल आये,
  293. सितारा डूबे सितारा-नुमा निकल आये;

  294. अजब नहीं कि ये दरिया नज़र का धोका हो,
  295. अजब नहीं कि कोई रास्ता निकल आये;

  296. ये किसने दश्ते-बुरीदा की फसल बोई थी,
  297. तमाम शहर में नख़्ल-दुआ निकल आये;

  298. बड़ी घुटन है, चराग़ों का क्या ख़याल करूँ,
  299. अब इस तरफ कोई मौजे-हवा निकल आये;

  300. खुदा करे सफे-सरदारगाँ न हो ख़ाली,
  301. जो मैं गिरूँ तो कोई दूसरा निकल आये।
  302. =================================
  303. कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई,
  304. हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई;

  305. आईने में हर अदा को देख कर कहते हैं वो,
  306. आज देखा चाहिये किस किस की है आई हुई;

  307. कह तो ऐ गुलचीं असीरान-ए-क़फ़स के वास्ते, 
  308. तोड़ लूँ दो चार कलियाँ मैं भी मुर्झाई हुई;

  309. मैं तो राज़-ए-दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे, 
  310. जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई;

  311. ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा सब में हया का है लगाव,
  312. हाए रे बचपन की शोख़ी भी है शर्माई हुई;

  313. गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला के कहा,
  314. वाह सर चढ़ने लगी पाँओं की ठुकराई हुई।
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  316. कभी बहुत है कभी ध्यान तेरा कुछ कम है,
  317. कभी हवा है कभी आँधियों का मौसम है;

  318. अभी न तोड़ा गया मुझ से कै़द-ए-हस्ती को,
  319. अभी शराब-ए-जुनूँ का नशा भी मद्धम है;

  320. कि जैसे साथ तेरे ज़िंदगी गुज़रती हो,
  321. तेरा ख़याल मेरे साथ ऐसे पैहम है;

  322. तमाम फ़िक्र-ए-ज़मान-ओ-मकाँ से छूट गई,
  323. सियाह-कारी-ए-दिल मुझे को ऐसा मरहम है;

  324. मैं ख़ुद मुसाफ़िर-ए-दिल हूँ उसे न रोकुँगी,
  325. वो ख़ुद ठहर न सकेगा जो कै़दी-ए-ग़म है;

  326. वौ शौक़-ए-तेज़-रवी है कि देखता है जहाँ,
  327. ज़मीं पे आग लगी आसमान बरहम है।
  328. =================================
  329. #वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें;
  330. वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें;

  331. ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई;
  332. ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें;

  333. #कभी न ख़त्म किया मैं ने रोशनी का मुहाज़;
  334. अगर चिराग़ बुझा, दिल जला लिया मैनें;

  335. कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था;
  336. वो तीर अपने कलेजे पे खा लिया मैनें;

  337. "क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था;
  338. उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें।
  339. =================================
  340. बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रखा,
  341. #अब कहते हो कि तुम ने मुझे मार तो रखा;

  342. कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की,
  343. हाँ यार के रूख़्सार पे रूख़्सार तो रखा;

  344. इतना भी ग़नीमत है तेरी तरफ़ से ज़ालिम,
  345. खिड़की न रखी रौज़न-ए-दीवार तो रखा;

  346. वो ज़ब्ह करे या न करे ग़म नहीं इस का,
  347. सर हम ने तह-ए-ख़ंजर-ए-ख़ूँ-ख़्वार तो रखा;

  348. इस इश्क़ की हिम्मत के मैं सदक़े हूँ कि 'बेगम',
  349. हर वक़्त मुझे मरने पे तैयार तो रखा।
  350. =================================
  351. दुख देकर सवाल करते हो,
  352. तुम भी गालिब, कमाल करते हो;

  353. देख कर पुछ लिया हाल मेरा,
  354. चलो इतना तो ख्याल करते हो;

  355. शहर-ए-दिल मेँ उदासियाँ कैसी,
  356. ये भी मुझसे सवाल करते हो;

  357. मरना चाहे तो मर नही सकते,
  358. तुम भी जीना मुहाल करते हो;

  359. अब किस-किस की मिसाल दूँ तुमको,
  360. तुम हर सितम बेमिसाल करते हो।
  361. =================================
  362. फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं.
  363. तुम ख़बर बे-ज़ार हो अहल-ए-नज़र जाता हूँ मैं;

  364. जेब में रख ली हैं क्यों तुम ने ज़ुबानें काट कर,
  365. किस से अब ये अजनबी पूछे किधर जाता हूँ मैं;

  366. हाँ मैं साया हूँ किसी शय का मगर ये भी तो देख,
  367. गर तआक़ुब में न हो सूरज तो मर जाता हूँ मैं;

  368. हाथ आँखों से उठा कर देख मुझ से कुछ न पूछ,
  369. क्यों उफ़ुक पर फैलती सुब्हों से डर जाता हूँ मैं;

  370. 'अर्श' रस्मों की पनह-गाहें भी अब सर पर नहीं,
  371. और वहशी रास्तों पर बे-सिपर जाता हूँ मैं।



  372. =================================

  373. बात बनती नहीं ऐसे हालात में,
  374. मैं भी जज़्बात में, तुम भी जज़्बात में;

  375. कैसे सहता है मिलके बिछडने का ग़म,
  376. उससे पूछेंगे अब के मुलाक़ात में;

  377. मुफ़लिसी और वादा किसी यार का,
  378. खोटा सिक्का मिले जैसे ख़ैरात में;

  379. जब भी होती है बारिश कही ख़ून की,
  380. भीगता हूं सदा मैं ही बरसात में;

  381. मुझको किस्मत ने इसके सिवा क्या दिया,
  382. कुछ लकीरें बढा दी मेरे हाथ में;

  383. ज़िक्र दुनिया का था, आपको क्या हुआ,
  384. आप गुम हो गए किन ख़यालात में;

  385. दिल में उठते हुए वसवसों के सिवा,
  386. कौन आता है 'साग़र' सियह रात में।
  387. =================================
  388. कितने शिकवे गिल हैं पहले ही,
  389. #राह में फ़ासले हैं पहले ही;

  390. कुछ तलाफ़ी निगार-ए-फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ,
  391. हम लुटे क़ाफ़िले हैं पहले ही;

  392. #और ले जाए गा कहाँ गुचीं,
  393. सारे मक़्तल खुले हैं पहले ही;

  394. #अब ज़बाँ काटने की रस्म न डाल,
  395. कि यहाँ लब सिले हैं पहले ही;

  396. और किस शै की है तलब 'फ़ारिग़',
  397. दर्द के सिलसिले हैं पहले ही।
  398. =================================
  399. चोट लगी तो अपने अन्दर चुपके चुपके रो लेते हो,
  400. अच्छी बात है आसानी से ज़ख्मों को तुम धो लेते हो;

  401. दिन भर कोशश करते हो सब को ग़म का दरमाँ मिल जाये,
  402. @नींद की गोली खाकर शब भर बेफ़िक्री में सो लेते हो;

  403. @अपनों से मोहतात रहो, सब नाहक़ मुश्रिक समझेंगे,
  404. ज्यों ही अच्छी मूरत देखी पीछे पीछे हो लेते हो;

  405. @ख़ुश-एख्लाक़ी ठीक है लेकिन सेहत पे ध्यान ज़रूरी है,
  406. बैठे बैठे सब के दुख में अपनी जान भिगो लेते हो;

  407. 2'अंसारी जी' आस न रक्खो कोई तुम्हें पढ़ पायेगा,
  408. क्या यह कम है पलकों में तुम हर्फ़-ए-अश्क पिरो लेते हो।
  409. =================================
  410. दिल ने एक एक दुख सहा तनहा,
  411. @अंजुमन अंजुमन रहा तन्हा;

  412. ढलते सायों में तेरे कूचे से,
  413. कोई गुज़रा है बारहा तन्हा;

  414. तेरी आहट क़दम क़दम और मैं,
  415. इस मइयत में भी रहा तन्हा;

  416. कहना यादों के बर्फ़-ज़ारों से,
  417. एक आँसू बहा बहा तनहा;

  418. डूबते साहिलों के मोड़ पे दिल,
  419. इक खंडर सा रहा सहा तन्हा;

  420. गूँजता रह गया ख़लाओं में;
  421. वक़्त का एक क़हक़हा तन्हा।
  422. =================================
  423. वही आँखों में और आँखों से पोशिदा भी रहता है,
  424. मेरी यादों में एक भूला हुआ चेहरा भी रहता है;

  425. जब उस की सर्द-मेहरी देखता हूँ बुझने लगता हूँ,
  426. मुझे अपनी अदाकारी का अंदाज़ा भी रहता है;

  427. मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता,
  428. मगर ख़ुद से बिछड़ जाने का अंदेशा भी रहता है;

  429. जो मुमकिन हो तो पुर-असरार दुनियाओं में दाख़िल हो,
  430. कि हर दीवार में एक चोर दरवाज़ा भी रहता है;

  431. बस अपनी बे-बसी की सातवीं मंज़िल में ज़िंदा हूँ,
  432. यहाँ पर आग भी रहती है और नौहा भी रहता है।
  433. =================================
  434. अजब यक़ीन उस शख़्स के गुमान में था,
  435. वो बात करते हुए भी नई उड़ान में था;

  436. हवा भरी हुई फिरती थी अब के साहिल पर,
  437. कुछ ऐसा हौसला कश्ती के बादबाँ में था;

  438. हमारे भीगे हुए पर नहीं खुले वर्ना,
  439. हमें बुलाता सितारा तो आसमान में था;

  440. उतर गया है रग-ओ-पय में ज़ाइक़ा उस का, 
  441. अजीब शहद सा कल रात उस ज़बान में था; 

  442. खुली तो आँख तो 'ताबिश' कमाल ये देखा,
  443. वो मेरी रूह में था और मैं मकान में था।
  444. =================================
  445. उदास रातों में तेज़ काफ़ी की तल्ख़ियों में,
  446. वो कुछ ज़ियादा ही याद आता है सर्दियों में; 

  447. मुझे इजाज़त नहीं है उस को पुकारने की,
  448. जो गूँजता है लहू में सीने की धड़कनों में;

  449. वो बचपना जो उदास राहों में खो गया था,
  450. मैं ढूँढता हूँ उसे तुम्हारी शरारतों में;

  451. उसे दिलासे तो दे रहा हूँ मगर से सच है,
  452. कहीं कोई ख़ौफ़ बढ़ रहा है तसल्लियों में; 

  453. तुम अपनी पोरों से जाने क्या लिख गए थे जानाँ,
  454. चराग़ रौशन हैं अब भी मेरी हथेलियों में;

  455. हर एक मौसम में रौशनी सी बिखेरते हैं,
  456. तुम्हारे ग़म के चराग़ मेरी उदासियों में।
  457. =================================
  458. कभी मुझ को साथ लेकर, कभी मेरे साथ चल के;
  459. वो बदल गए अचानक, मेरी ज़िन्दगी बदल के; 

  460. हुए जिस पे मेहरबाँ, तुम कोई ख़ुशनसीब होगा; 
  461. मेरी हसरतें तो निकलीं, मेरे आँसूओं में ढल के; 

  462. तेरी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ के, क़ुर्बाँ दिल-ए-ज़ार ढूँढता है;
  463. वही चम्पई उजाले, वही सुरमई धुंधल के; 

  464. कोई फूल बन गया है, कोई चाँद कोई तारा; 
  465. जो चिराग़ बुझ गए हैं, तेरी अंजुमन में जल के; 

  466. मेरे दोस्तो ख़ुदारा, मेरे साथ तुम भी ढूँढो; 
  467. वो यहीं कहीं छुपे हैं, मेरे ग़म का रुख़ बदल के; 

  468. तेरी बेझिझक हँसी से, न किसी का दिल हो मैला;
  469. ये नगर है आईनों का, यहाँ साँस ले संभल के।
  470. =================================
  471. महक उठा है आँगन...

  472. महक उठा है आँगन इस ख़बर से;
  473. वो ख़ुशबू लौट आई है सफ़र से;

  474. जुदाई ने उसे देखा सर-ए-बाम;
  475. दरीचे पर शफ़क़ के रंग बरसे;

  476. मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था; 
  477. उतारे कौन अब दीवार पर से;

  478. गिला है एक गली से शहर-ए-दिल की;
  479. मैं लड़ता फिर रहा हूँ शहर भर से;

  480. उसे देखे ज़माने भर का ये चाँद;
  481. हमारी चाँदनी छाए तो तरसे;

  482. मेरे मानन गुज़रा कर मेरी जान;
  483. कभी तू खुद भी अपनी रहगुज़र से।
  484. =================================
  485. कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्किल है;
  486. यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है;

  487. इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं;
  488. के हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है;

  489. ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा;
  490. मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल;

  491. है जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुंजलाकर;
  492. अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है;

  493. हज़ारों दिल मसल कर पांओ से झुंजला के फ़रमाया;
  494. लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है।


  495. =================================
  496. अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
  497. मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको;

  498. मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने,
  499. ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको;

  500. ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन,
  501. कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको;

  502. बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ 'क़तील',
  503. शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।
  504. =================================
  505. निकले हम कहाँ से और किधर निकले;
  506. हर मोड़ पे चौंकाए ऐसा अपना सफ़र निकले;

  507. तु समझाया किया रो-रो के अपनी बात;
  508. तेरे हमदर्द भी लेकिन बड़े बे-असर निकले;

  509. बरसों करते रहे उनके पैगाम का इंतजार;
  510. जब आया वो तो उनके बेवफा होने की खबर निकले;

  511. अब संभले के चले 'ज़हर' और सफ़र की सोच;
  512. ऐसा ना हो कि फिर से ये जगह उसी का शहर निकले;

  513. तु भी रखता इरादे ऊँचे तेरा भी कोई मक़ाम होता;
  514. पर तेरी किस्मत की हमेशा हर बात पे मगर निकले।
  515. =================================
  516. प्यार करने की यह इस दिल को सज़ा दी जाए;
  517. उसकी तस्वीर सरे-आम लगा दी जाए;

  518. ख़त में इस बार उसे भेजिये सूखा पत्ता;
  519. और उस पत्ते पे इक आँख बना दी जाए;

  520. इतनी पी जाए कि मिट जाए मन-ओ-तू की तमीज़;
  521. यानि ये होश की दीवार गिरा दी जाए;

  522. आज हर शय का असर लगता है उल्टा यारो;
  523. आज `शहज़ाद' को जीने की दुआ दी जाए।
  524. =================================
  525. @आँखों से मेरे इस लिए लाली नहीं जाती;
  526. यादों से कोई रात खा़ली नहीं जाती;

  527. अब उम्र, ना मौसम, ना रास्‍ते के वो पत्‍ते;
  528. इस दिल की मगर ख़ाम ख्‍़याली नहीं जाती;

  529. @माँगे तू अगर जान भी तो हँस कर तुझे दे दूँ;
  530. तेरी तो कोई बात भी टाली नहीं जाती;

  531. @मालूम हमें भी हैं बहुत से तेरे क़िस्से;
  532. @पर बात तेरी हमसे उछाली नहीं जाती;

  533. हमराह तेरे फूल खिलाती थी जो दिल में
  534. अब शाम वहीं दर्द से ख़ाली नहीं जाती;

  535. हम जान से जाएंगे तभी बात बनेगी;
  536. तुमसे तो कोई बात निकाली नहीं जाती।
  537. =================================
  538. अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले,
  539. दश्त पड़ता है मियां इश्क़ में घर से पहले;

  540. चल दिये उठके सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब,
  541. पूछ लेना था किसी ख़ाक बसर से पहले;

  542. इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा,
  543. इतने तड़पे हैं न घबराये न तरसे पहले;

  544. जी बहलता ही नहीं अब कोई सअत कोई पल,
  545. रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले;

  546. हम किसी दर पे न ठिठके न कहीं दस्तक दी,
  547. सैकड़ों दर थे मेरी जां तेरे दर से पहले;

  548. चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा,
  549. हमको सौ बार हुई सुबह सहर से पहल।
  550. =================================
  551. मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा;
  552. अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा;

  553. ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा;
  554. ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा;

  555. मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा;
  556. कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा;

  557. कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए;
  558. जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा;

  559. मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे;
  560. सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा;

  561. हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम;
  562. मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा।
  563. =================================

  564. तेरे दर से उठकर जिधर जाऊं मैं;
  565. चलूँ दो कदम और ठहर जाऊं मैं;

  566. अगर तू ख़फा हो तो परवा नहीं;
  567. तेरा गम ख़फा हो तो मर जाऊं मैं;

  568. तब्बसुम ने इतना डसा है मुझे;
  569. कली मुस्कुराए तो डर जाऊं मैं;

  570. सम्भाले तो हूँ खुदको, तुझ बिन मगर; 
  571. जो छू ले कोई तो बिखर जाऊं मैं।
  572. =================================
  573. पहले तो अपने दिल की...

  574. पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये;
  575. फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये;

  576. पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये;
  577. फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये;

  578. कुछ कह रही है आपके सीने की धड़कने;
  579. मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये;

  580. इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास;
  581. ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये;

  582. शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो;
  583. आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये।
  584. =================================
  585. आज भड़की रग-ए-वहशत तेरे दीवानों की;
  586. क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की;

  587. फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा;
  588. टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की;

  589. आज क्या सूझ रही है तिरे दीवानों को;
  590. धज्जियाँ ढूँढते फिरते हैं गरेबानों की;

  591. रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में;
  592. ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की;

  593. उस ने 'एहसान' कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा;
  594. दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की।
  595. =================================
  596. मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला;
  597. साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला;

  598. मुझ में बसी हुई थी किसी और की महक;
  599. दिल बुझ गया कि रात वो बरहम नहीं मिला;

  600. बस अपने सामने ज़रा आँखें झुकी रहीं;
  601. वर्ना मिरी अना में कहीं ख़म नहीं मिला;

  602. उस से तरह तरह की शिकायत रही मगर;
  603. मेरी तरफ़ से रंज उसे कम नहीं मिला;

  604. एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए;
  605. ये क्या हुआ कि वक़्फ़ा-ए-मातम नहीं मिला।

  606. =================================


  607. अक्सर मिलना ऐसा हुआ बस;
  608. लब खोले और उसने कहा बस;

  609. तब से हालत ठीक नहीं है;
  610. मीठा मीठा दर्द उठा बस;

  611. सारी बातें खोल के रखो;
  612. मैं हूं तुम हो और खुदा बस;

  613. तुमने दुख में आंख भिगोई;
  614. मैने कोई शेर कहा बस;

  615. वाकिफ़ था मैं दर्द से उसके;
  616. मिल कर मुझसे फूट पड़ा बस;

  617. @जाने भी तो बात हटाओ;
  618. तुम जीते मैं हार गया बस;

  619. इस @सहरा में इतना कर दे;
  620. मीठा चश्मा,पेड़,हवा बस।
  621. =================================
  622. @तेरी सूरत जो दिलनशीं की है;
  623. आशना शक्ल हर हसीं की है;

  624. हुस्न से दिल लगा के हस्ती की;
  625. @हर घड़ी हमने आतशीं की है;

  626. सुबह-ए-गुल हो की शाम-ए-मैख़ाना;
  627. मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है;

  628. शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं;
  629. हमने तौबा अभी नहीं की है;

  630. ज़िक्र-ए-दोज़ख़, बयान-ए-हूर-ओ-कुसूर;
  631. बात गोया यहीं कहीं की है;

  632. फ़ैज़ औज-ए-ख़याल से हमने;
  633. आसमां सिन्ध की ज़मीं की है।
  634. =================================
  635. अब किस से कहें और कौन सुने जो हाल तुम्हारे बाद हुआ;
  636. इस दिल की झील सी आँखों में इक ख़्वाब बहुत बर्बाद हुआ;

  637. ये हिज्र-हवा भी दुश्मन है इस नाम के सारे रंगों की;
  638. वो नाम जो मेरे होंटों पे ख़ुशबू की तरह आबाद हुआ;

  639. उस शहर में कितने चेहरे थे कुछ याद नहीं सब भूल गए;
  640. इक शख़्स किताबों जैसा था वो शख़्स ज़बानी याद हुआ;

  641. वो अपने गाँव की गलियाँ थी दिल जिन में नाचता गाता था;
  642. अब इस से फ़र्क नहीं पड़ता नाशाद हुआ या शाद हुआ;

  643. बेनाम सताइश रहती थी इन गहरी साँवली आँखों में;
  644. ऐसा तो कभी सोचा भी न था अब जितना बेदाद हुआ।
  645. =================================
  646. कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता;
  647. तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता;

  648. तर्क-ए-दुनिया का ये दावा है फ़ुज़ूल ऐ ज़ाहिद;
  649. बार-ए-हस्ती तो ज़रा सर से उतारा होता;

  650. वो अगर आ न सके मौत ही आई होती;
  651. हिज्र में कोई तो ग़म-ख़्वार हमारा होता;

  652. ज़िन्दगी कितनी मुसर्रत से गुज़रती या रब;
  653. ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता;

  654. अज़मत-ए-गिर्या को कोताह-नज़र क्या समझें;
  655. अश्क अगर अश्क न होता तो सितारा होता;

  656. कोई हम-दर्द ज़माने में न पाया 'अख़्तर';
  657. दिल को हसरत ही रही कोई हमारा होता।
  658. =================================
  659. उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज;
  660. नाज़िल हुई बला मेरे सर पर कहाँ से आज;

  661. तड़पूँगा हिज्र-ए-यार में है रात चौधवीं;
  662. तन चाँदनी में होगा मुक़ाबिल कताँ से आज;

  663. दो-चार रश्क-ए-माह भी हम-राह चाहिएँ;
  664. वादा है चाँदनी में किसी मेहर-बाँ से आज;

  665. हंगाम-ए-वस्ल रद्द-ओ-बदल मुझ से है अबस;
  666. निकलेगा कुछ न काम नहीं और हाँ से आज;

  667. क़ार-ए-बदन में रूह पुकारी ये वक़्त-ए-नज़ा;
  668. मुद्दत के बाद उठते हैं हम इस मकाँ से आज;

  669. अँधेर था निगाह-ए-'अमानत' में शाम सहर;
  670. तुम चाँद की तरह निकल आए कहाँ से आज।
  671. =================================
  672. तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे;
  673. तभी से ये मेरे जमीन-ओ-आसमान नहीं रहे;

  674. खंडहर का रूप धरने लगे है बाग शहर के;
  675. वो फूल-ओ-दरख्त, वो समर यहाँ नहीं रहे;

  676. सब अपनी अपनी सोच अपनी फिकर के असीर हैं; 
  677. तुम्हारें शहर में मेरे मिजाज़ दा नहीं रहें;

  678. उसे ये गम है, शहर ने हमारी बात जान ली;
  679. हमें ये दुःख है उस के रंज भी निहां नहीं रहे;

  680. बोहत है यूँ तो मेरे इर्द-गिर्द मेरे आशना;
  681. तुम्हारे बाद धडकनों के राजदान नहीं रहे;

  682. असीर हो के रह गए हैं शहर की फिजाओं में;
  683. परिंदे वाकई चमन के तर्जुमान नहीं रहे।
  684. =================================
  685. जग में आकर इधर उधर देखा;
  686. तू ही आया नज़र जिधर देखा;

  687. जान से हो गए बदन ख़ाली;
  688. जिस तरफ़ तूने आँख भर देखा;

  689. नाला, फ़रियाद, आह और ज़ारी;
  690. आप से हो सका सो कर देखा;

  691. उन लबों ने की न मसीहाई;
  692. हम ने सौ-सौ तरह से मर देखा;

  693. ज़ोर आशिक़ मिज़ाज है कोई;
  694. 'दर्द' को क़िस्स:-ए- मुख्तसर देखा।
  695. =================================
  696. गुल को महबूब में क़यास किया;
  697. फ़र्क़ निकला बहोत जो बास किया;

  698. दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना;
  699. एक आलम से रू-शिनास किया;

  700. कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन;
  701. शौक़ ने हम को बे-हवास किया;

  702. सुबह तक शमा सर को ढुँढती रही;
  703. क्या पतंगे ने इल्तेमास किया;

  704. ऐसे वहाशी कहाँ हैं अए ख़ुबाँ;
  705. 'मीर' को तुम ने अबस उदास किया।
  706. =================================
  707. न जाओ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार देखते जाओ;
  708. कि जी न चाहे तो नाचार देखते जाओ;

  709. बहार-ए-उमर् में बाग़-ए-जहाँ की सैर करो;
  710. खिला हुआ है ये गुलज़ार देखते जाओ;

  711. उठाओ आँख, न शरमाओ ,ये तो महिफ़ल है;
  712. ग़ज़ब से जानिब-ए-अग़यार देखते जाओ;

  713. हुआ है क्या अभी हंगामा अभी कुछ होगा;
  714. फ़ुगां में हश्र के आसार देखते जाओ;

  715. तुम्हारी आँख मेरे दिल से बेसबब-बेवजह;
  716. हुई है लड़ने को तय्यार देखते जाओ;

  717. न जाओ बंद किए आँख रहरवान-ए-अदम;
  718. इधर-उधर भी ख़बरदार देखते जाओ;

  719. कोई न कोई हर इक शेर में है बात ज़रूर;
  720. जनाबे-दाग़ के अशआर देखते जाओ।
  721. =================================
  722. डरा के मौज-ओ-तलातुम से हमनशीनों को;
  723. यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को;

  724. शराब हो ही गई है बक़द्रे-पैमाना;
  725. ब-अ़ज़्मे-तर्क निचोड़ा जो आस्‍तीनों को;

  726. जमाले-सुबह दिया रू-ए-नौबहार दिया;
  727. मेरी निग़ाह भी देता ख़ुदा हसीनों को;

  728. हमारी राह में आए हज़ार मैख़ाने;
  729. भुला सके न मगर होश के क़रीनों को;

  730. कभी नज़र भी उठाई न सू-ए-बादा-ए-नाब;
  731. कभी चढ़ा गए पिघला के आबगीनों को;

  732. हुए है क़ाफ़िले जुल्मत की वादियों में रवाँ;
  733. चिराग़े राह किए ख़ूंचका जबीनों को;

  734. तुझे न माने कोई तुझको इससे क्या 'मजरूह';
  735. चल अपनी राह, भटकने दे नुक़्ताचीनों को।



  736. =================================
  737. मय रहे, मीना रहे...

  738. मय रहे, मीना रहे, ग़र्दिश में पैमाना रहे;
  739. मेरे साक़ी तू रहे, आबाद मयखाना रहे;

  740. हश्र भी तो हो चुका, रुख़ से नहीं हटती नक़ाब;
  741. हद भी आख़िर कुछ है, कब तक कोई दीवाना रहे;

  742. रात को जा बैठते हैं, रोज़ हम मजनूं के पास;
  743. पहले अनबन रह चुकी है, अब तो याराना रहे;

  744. ज़िन्दगी का लुत्फ़ हो, उड़ती रहे हरदम रियाज़;
  745. हम हों, शीशे की परी हो,घर परीखाना रहे।
  746. =================================
  747. ख़्वाब इस आँखों से अब कोई चुरा कर ले जाये;
  748. क़ब्र के सूखे हुए फूल उठा कर ले जाये;

  749. मुंतज़िर फूल में ख़ुश्बू की तरह हूँ कब से;
  750. कोई झोंकें की तरह आये उड़ा कर ले जाये;

  751. ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी;
  752. जो हथेली पे रची मेहंदी उड़ा कर ले जाये;

  753. मैं मोहब्बत से महकता हुआ ख़त हूँ मुझ को;
  754. ज़िन्दगी अपनी किताबों में दबा कर ले जाये;

  755. ख़ाक इंसाफ़ है नाबीना बुतों के आगे;
  756. रात थाली में चिराग़ों को सजा कर ले जाये।
  757. =================================
  758. दिल को क्या हो गया...

  759. दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने;
  760. क्यों है ऐसा उदास क्या जाने;

  761. कह दिया मैं ने हाल-ए-दिल अपना;
  762. इस को तुम जानो या ख़ुदा जाने;

  763. जानते जानते ही जानेगा;
  764. मुझ में क्या है वो अभी क्या जाने;

  765. तुम न पाओगे सादा दिल मुझसा;
  766. जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने।
  767. =================================
  768. क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते;
  769. कुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते;

  770. अपने मर्ज़-ए-ग़म का हकीम और कोई है;
  771. हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते;

  772. मालूम नहीं हम से हिजाब उन को है कैसा;
  773. औरों से तो वो शर्म ओ हया कुछ नहीं करते;

  774. गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरत;
  775. पर दिल को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते;

  776. वो दिल-बरी अब तक मेरी कुछ करते हैं लेकिन;
  777. तासीर तेरे नाले दिला कुछ नहीं करते;

  778. करते हैं वो इस तरह 'ज़फ़र' दिल पे जफ़ाएँ;
  779. ज़ाहिर में ये जानो के जफ़ा कुछ नहीं करते।
  780. =================================
  781. अक्सर मिलना ऐसा हुआ बस;
  782. लब खोले और उसने कहा बस;

  783. तब से हालत ठीक नहीं है;
  784. मीठा मीठा दर्द उठा बस;

  785. सारी बातें खोल के रखो;
  786. मैं हूं तुम हो और खुदा बस;

  787. तुमने दुख में आंख भिगोई;
  788. मैने कोई शेर कहा बस;

  789. वाकिफ़ था मैं दर्द से उसके;
  790. मिल कर मुझसे फूट पड़ा बस;

  791. इस सहरा में इतना कर दे;
  792. मीठा चश्मा, पेड़, हवा बस।
  793. =================================
  794. कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते;
  795. हम मुजरिम-ए-तौहीन-ए-वफ़ा हो नहीं सकते;

  796. ऐ मौज-ए-हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या;
  797. हम अहल-ए-मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते;

  798. इतना तो बता जाओ ख़फ़ा होने से पहले;
  799. वो क्या करें जो तुम से ख़फ़ा हो नहीं सकते;

  800. इक आप का दर है मेरी दुनिया-ए-अक़ीदत;
  801. ये सजदे कहीं और अदा हो नहीं सकते;

  802. अहबाब पे दीवाने 'असद' कैसा भरोसा;
  803. ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते।
  804. =================================
  805. वो खफा है तो कोई बात नहीं;
  806. इश्क मोहताज-ए-इल्त्फाक नहीं;

  807. दिल बुझा हो अगर तो दिन भी है रात नहीं;
  808. दिन हो रोशन तो रात रात नहीं;

  809. दिल-ए-साकी मैं तोड़ू-ए-वाइल;
  810. जा मुझे ख्वाइश-ए-नजात नहीं;

  811. ऐसी भूली है कायनात मुझे;
  812. जैसे मैं जिस्ब-ए-कायनात नहीं;

  813. पीर की बस्ती जा रही है मगर;
  814. सबको ये वहम है कि रात नहीं;

  815. मेरे लायक नहीं हयात "ख़ुमार";
  816. और मैं लायक-ए-हयात नहीं।
  817. =================================
  818. भूला हूँ मैं आलम को सर-शार इसे कहते हैं;
  819. मस्ती में नहीं ग़ाफ़िल हुश्यार इसे कहते हैं;

  820. गेसू इसे कहते हैं रुख़सार इसे कहते हैं;
  821. सुम्बुल इसे कहते हैं गुल-ज़ार इसे कहते हैं;

  822. इक रिश्ता-ए-उल्फ़त में गर्दन है हज़ारों की;
  823. तस्बीह इसे कहते हैं ज़ुन्नार इसे कहते हैं;

  824. महशर का किया वादा याँ शक्ल न दिखलाई;
  825. इक़रार इसे कहते हैं इंकार इसे कहते हैं;

  826. टकराता हूँ सर अपना क्या क्या दर-ए-जानाँ से;
  827. जुम्बिश भी नहीं करती दीवार इसे कहते हैं;

  828. ख़ामोश 'अमानत' है कुछ उफ़ भी नहीं करता;
  829. क्या क्या नहीं ऐ प्यारे अग़्यार इसे कहते हैं।
  830. =================================
  831. अजब अपना हाल होता...

  832. अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता;
  833. कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता;

  834. न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में;
  835. कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता;

  836. ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती;
  837. न तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता;

  838. तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते;
  839. अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता।
  840. =================================
  841. तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना;
  842. अगर वो ख़ुश है मुझे बे-क़रार करते हुए;

  843. तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि कोई टूट गया;
  844. मोहब्बतों को बहुत पाएदार करते हुए;

  845. मैं मुस्कुराता हुआ आईने में उभरूँगा;
  846. वो रो पड़ेगी अचानक सिंघार करते हुए; 

  847. मुझे ख़बर थी कि अब लौट कर न आऊँगा;
  848. सो तुझ को याद किया दिल पे वार करते हुए; 

  849. ये कह रही थी समुंदर नहीं ये आँखें हैं;
  850. मैं इन में डूब गया ए'तिबार करते हुए;

  851. भँवर जो मुझ में पड़े हैं वो मैं ही जानता हूँ;
  852. तुम्हारे हिज्र के दरिया को पार करते हुए।


  853. =================================


  854. हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए;
  855. ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो ख़ुदा के लिए;

  856. गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में;
  857. हम आप डूबे किसी अपने आशना के लिए;

  858. जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को;
  859. ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए;

  860. वो आईना है के जिस को है हाजत-ए-सीमाब;
  861. इक इज़्तिराब है काफ़ी दिल-ए-सफ़ा के लिए;

  862. तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल;
  863. जो तेरे तीर का रोज़न न हो हवा के लिए;

  864. जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-फ़ख़रूद्दीन;
  865. तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतया के लिए।
  866. =================================
  867. तुम्हारे जैसे लोग जबसे मेहरबान नहीं रहे;
  868. तभी से ये मेरे जमीन-ओ-आसमान नहीं रहे;

  869. खंडहर का रूप धरने लगे है बाग शहर के;
  870. वो फूल-ओ-दरख्त, वो समर यहाँ नहीं रहे;

  871. सब अपनी अपनी सोच अपनी फिकर के असीर हैं;
  872. तुम्हारें शहर में मेरे मिजाज़ दा नहीं रहें;

  873. उसे ये गम है, शहर ने हमारी बात जान ली;
  874. हमें ये दुःख है उस के रंज भी निहां नहीं रहे;

  875. बोहत है यूँ तो मेरे इर्द-गिर्द मेरे आशना;
  876. तुम्हारे बाद धडकनों के राजदान नहीं रहे;

  877. असीर हो के रह गए हैं शहर की फिजाओं में;
  878. परिंदे वाकई चमन के तर्जुमान नहीं रहे।
  879. =================================
  880. तुझे कौन जानता था मेरी दोस्ती से पहले;
  881. तेरा हुस्न कुछ नहीं था मेरी शायरी से पहले;

  882. इधर आ रक़ीब मेरे मैं तुझे गले लगा लूँ;
  883. मेरा इश्क़ बे-मज़ा था तेरी दुश्मनी से पहले;

  884. कई इंक़लाब आए कई ख़ुश-ख़िराब गुज़रे;
  885. न उठी मगर क़यामत तेरी कम-सिनी से पहले;

  886. मेरी सुबह के सितारे तुझे ढूँढती हैं आँखें;
  887. कहीं रात डस न जाए तेरी रौशनी से पहले।
  888. =================================
  889. कुछ और दिन अभी इस जा क़याम करना था;
  890. यहाँ चराग़ वहाँ पर सितारा धरना था;

  891. वो रात नींद की दहलीज़ पर तमाम हुई;
  892. अभी तो ख़्वाब पे इक और ख़्वाब धरना था;

  893. अगर रसा में न था वो भरा भरा सा बदन;
  894. रंग-ए-ख़याल से उस को तुलू करना था;

  895. निगाह और चराग़ और ये असासा-ए-जाँ;
  896. तमाम होती हुई शब के नाम करना था;

  897. गुरेज़ होता चला जा रहा था मुझ से वो;
  898. और एक पल के सिरे पर मुझे ठहरना था।
  899. =================================
  900. हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
  901. एक तू ही नहीं है;

  902. नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं,
  903. ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं,
  904. कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है;

  905. हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है,
  906. हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है,
  907. तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है;

  908. हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है,
  909. यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है,
  910. यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है।
  911. =================================
  912. रात के ख्वाब सुनाए किस को रात के ख्वाब सुहाने थे;
  913. धुंधले धुंधले चेहरे थे पर सब जाने पहचाने थे;

  914. जिद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग;
  915. होंठ उन के ग़ज़लों के मिसरे आंखों में अफ़साने थे;

  916. ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी;
  917. इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे;

  918. हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने;
  919. हम क्यूं उन के दर पे उतरे कितने और ठिकाने थे;

  920. वहशत की उन्वान हमारी इन में से जो नार बनी;
  921. देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इन्शा' जी दीवाने थे।
  922. =================================
  923. बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है;
  924. जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है;

  925. कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया;
  926. हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है;

  927. तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने;
  928. मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है;

  929. कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ;
  930. जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती है;

  931. डरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँ;
  932. अहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है।
  933. =================================
  934. हर एक चेहरा यहाँ पर गुलाल होता है;
  935. हमारे शहर में पत्थर भी लाल होता है;

  936. मैं शोहरतों की बुलंदी पर जा नहीं सकता;
  937. जहाँ उरूज पर पहुँचो ज़वाल होता है;

  938. मैं अपने बच्चों को कुछ भी तो दे नहीं पाया;
  939. कभी-कभी मुझे ख़ुद भी मलाल होता है;

  940. यहीं से अमन की तबलीग रोज़ होती है;
  941. यहीं पे रोज़ कबूतर हलाल होता है;

  942. मैं अपने आप को सय्यद तो लिख नहीं सकता;
  943. अजान देने से कोई बिलाल होता है;

  944. पड़ोसियों की दुकानें तक नहीं खुलतीं;
  945. किसी का गाँव में जब इन्तिकाल होता है।
  946. =================================
  947. दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं;
  948. सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं;

  949. हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे;
  950. हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं;

  951. बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आश्ना भी नहीं;
  952. इसी में खुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं;

  953. ये मैकदा है, वो मस्जिद है, वो है बुत-खाना;
  954. कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं;

  955. हमारे शहर के मंजर न देख पायेंगे;
  956. यहाँ के लोग तो आँखों में ख्वाब रखते हैं।
  957. =================================
  958. बहुत मिला न मिला ज़िन्दगी से ग़म क्या है;
  959. मता-ए-दर्द बहम है तो बेश-ओ-कम क्या है;

  960. हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ; 
  961. के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है;

  962. करे न जग में अलाव तो शेर किस मक़सद;
  963. करे न शहर में जल-थल तो चश्म-ए-नम क्या है;

  964. अजल के हाथ कोई आ रहा है परवाना;
  965. न जाने आज की फ़ेहरिस्त में रक़म क्या है;

  966. सजाओ बज़्म ग़ज़ल गाओ जाम ताज़ा करो;
  967. बहुत सही ग़म-ए-गेती शराब कम क्या है;

  968. लिहाज़ में कोई कुछ दूर साथ चलता है;
  969. वरना दहर में अब ख़िज़्र का भरम क्या है



  970. =================================
  971. आँखों से मेरे इस लिए लाली नहीं जाती;
  972. यादों से कोई रात खा़ली नहीं जाती;

  973. अब उम्र, ना मौसम, ना रास्‍ते के वो पत्‍ते;
  974. इस दिल की मगर ख़ाम ख्‍़याली नहीं जाती;

  975. माँगे तू अगर जान भी तो हँस कर तुझे दे दूँ;
  976. तेरी तो कोई बात भी टाली नहीं जाती;

  977. मालूम हमें भी हैं बहुत से तेरे क़िस्से;
  978. पर बात तेरी हमसे उछाली नहीं जाती;

  979. हमराह तेरे फूल खिलाती थी जो दिल में;
  980. अब शाम वहीं दर्द से ख़ाली नहीं जाती;

  981. हम जान से जाएंगे तभी बात बनेगी;
  982. तुमसे तो कोई बात निकाली नहीं जाती।
  983. =================================
  984. रेत की सूरत जाँ प्यासी थी आँख हमारी नम न हुई;
  985. तेरी दर्द-गुसारी से भी रूह की उलझन कम न हुई;

  986. शाख़ से टूट के बे-हुरमत हैं वैसे बे-हुरमत थे;
  987. हम गिरते पत्तों पे मलामत कब मौसम मौसम न हुई;

  988. नाग-फ़नी सा शोला है जो आँखों में लहराता है;
  989. रात कभी हम-दम न बनी और नींद कभी मरहम न हुई;

  990. अब यादों की धूप छाँव में परछाईं सा फिरता हूँ;
  991. मैंने बिछड़ कर देख लिया है दुनिया नरम क़दम न हुई;

  992. मेरी सहरा-ज़ाद मोहब्बत अब्र-ए-सियह को ढूँडती है;
  993. एक जनम की प्यासी थी इक बूँद से ताज़ा-दम न हुई।
  994. =================================
  995. तुझे खोकर भी तुझे पाऊं जहाँ तक देखूँ;
  996. हुस्न-ए-यज़्दां से तुझे हुस्न-ए-बुतां तक देखूं;

  997. तूने यूं देखा है जैसे कभी देखा ही न था;
  998. मैं तो दिल में तेरे क़दमों के निशां तक देखूँ;

  999. सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी हैं हज़ारों बातें;
  1000. मै तेरा हुस्न तेरे हुस्न-ए-बयां तक देखूँ;

  1001. वक़्त ने ज़ेहन में धुंधला दिये तेरे खद्द-ओ-खाल;
  1002. यूं तो मैं तूटते तारों का धुआं तक देखूँ;

  1003. दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता;
  1004. मैं फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ;

  1005. एक हक़ीक़त सही फ़िरदौस में हूरों का वजूद;
  1006. हुस्न-ए-इन्सां से निपट लूं तो वहाँ तक देखूँ।
  1007. =================================
  1008. कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं;
  1009. मोहब्बतों के भी मौसम अजीब होते हैं;

  1010. ज़िहानतों को कहाँ वक़्त ख़ूँ बहाने का;
  1011. हमारे शहर में किरदार क़त्ल होते हैं;

  1012. फ़ज़ा में हम ही बनाते हैं आग के मंज़र;
  1013. समंदरों में हमीं कश्तियाँ डुबोते हैं;

  1014. पलट चलें के ग़लत आ गए हमीं शायद;
  1015. रईस लोगों से मिलने के वक़्त होते हैं;

  1016. मैं उस दियार में हूँ बे-सुकून बरसों से;
  1017. जहाँ सुकून से अजदाद मेरे सोते हैं;

  1018. गुज़ार देते हैं उम्रें ख़ुलूस की ख़ातिर;
  1019. पुराने लोग भी 'अज़हर' अजीब होते हैं।
  1020. =================================

  1021. इसी में ख़ुश हूँ मेरा दुख कोई तो सहता है;
  1022. चली चलूँ कि जहाँ तक ये साथ रहता है;

  1023. ज़मीन-ए-दिल यूँ ही शादाब तो नहीं ऐ दोस्त;
  1024. क़रीब में कोई दरिया ज़रूर बहता है;

  1025. न जाने कौन सा फ़िक़्रा कहाँ रक़्म हो जाये;
  1026. दिलों का हाल भी अब कौन किस से कहता है;

  1027. मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की;
  1028. भरी बहार में जैसे मकान ढहता है।
  1029. =================================
  1030. तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो;
  1031. जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो;

  1032. तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू;
  1033. औए इतने ही बेमुरव्वत हो;

  1034. तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं;
  1035. यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो; 

  1036. है मेरी आरज़ू के मेरे सिवा;
  1037. तुम्हें सब शायरों से वहशत हो;

  1038. किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ;
  1039. तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो;

  1040. किस लिए देखते हो आईना;
  1041. तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो;

  1042. दास्ताँ ख़त्म होने वाली है;
  1043. तुम मेरी आख़िरी मोहब्बत हो।
  1044. =================================
  1045. तेरी महफ़िल में यह कसरत कभी थी;
  1046. हमारे रंग की सोहबत कभी थी;

  1047. इस आज़ादी में वहशत कभी थी;
  1048. मुझे अपने से भी नफ़रत कभी थी;

  1049. हमारा दिल, हमारा दिल कभी था;
  1050. तेरी सूरत, तेरी सूरत कभी थी;

  1051. हुआ इन्सान की आँखों से साबित;
  1052. अयाँ कब नूर में जुल्मत कभी थी;

  1053. दिल-ए-वीराँ में बाक़ी हैं ये आसार;
  1054. यहाँ ग़म था, यहाँ हसरत कभी थी;

  1055. तुम इतराए कि बस मरने लगा 'दाग़';
  1056. बनावट थी जो वह हालत कभी थी।
  1057. =================================

  1058. उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब;
  1059. चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब;

  1060. जिस दिन से तुम रूठीं मुझ से रूठे-रूठे हैं;
  1061. चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब;

  1062. मुझसे बिछड़ कर वह भी कहाँ अब पहले जैसी है;
  1063. फीके पड़ गए कपड़े-वपड़े, ज़ेवर-वेवर सब;

  1064. आखिर मै किस दिन डूबूँगा फ़िक्रें करते है;
  1065. कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया लंगर-वंगर सब।
  1066. =================================

  1067. कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा;
  1068. मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा;

  1069. तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं;
  1070. कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा;

  1071. समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता;
  1072. ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा;

  1073. मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता;
  1074. कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा।
  1075. =================================..

  1076. बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा;
  1077. इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा;

  1078. इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश;
  1079. फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा;

  1080. यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं;
  1081. जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा;

  1082. काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली;
  1083. तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा;

  1084. किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर;
  1085. वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा।

  1086. =================================


  1087. मय रहे, मीना रहे, ग़र्दिश में...

  1088. मय रहे, मीना रहे, ग़र्दिश में पैमाना रहे;
  1089. मेरे साक़ी तू रहे, आबाद मयखाना रहे;

  1090. हश्र भी तो हो चुका, रुख़ से नहीं हटती नक़ाब;
  1091. हद भी आख़िर कुछ है, कब तक कोई दीवाना रहे;

  1092. रात को जा बैठते हैं, रोज़ हम मजनूं के पास;
  1093. पहले अनबन रह चुकी है, अब तो याराना रहे;

  1094. ज़िन्दगी का लुत्फ़ हो, उड़ती रहे हरदम रियाज़;
  1095. हम हों, शीशे की परी हो,घर परीखाना रहे।
  1096. =================================
  1097. कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी;
  1098. सुनते थे वो आयेंगे, सुनते थे सहर होगी;

  1099. कब जान लहू होगी, कब अश्क गुहार होगा;
  1100. किस दिन तेरी शनवाई, ऐ दीदा-ए-तर होगी;

  1101. कब महकेगी फसले-गुल, कब बहकेगा मयखाना;
  1102. कब सुबह-ए-सुखन होगी, कब शाम-ए-नज़र होगी;

  1103. वाइज़ है न जाहिद है, नासेह है न क़ातिल है;
  1104. अब शहर में यारों की, किस तरह बसर होगी;

  1105. कब तक अभी रह देखें, ऐ कांटे-जनाना;
  1106. कब अश्र मुअय्यन है, तुझको तो ख़बर होगी।
  1107. =================================
  1108. झूठा निकला क़रार तेरा;
  1109. अब किसको है ऐतबार तेरा;

  1110. दिल में सौ लाख चुटकियाँ लीं;
  1111. देखा बस हम ने प्यार तेरा;

  1112. दम नाक में आ रहा था अपने;
  1113. था रात ये इंतिज़ार तेरा;

  1114. कर ज़बर जहाँ तलक़ तू चाहे;
  1115. मेरा क्या, इख्तियार तेरा;

  1116. लिपटूँ हूँ गले से आप अपने;
  1117. समझूँ कि है किनार तेरा;

  1118. "इंशा" से मत रूठ, खफा हो;
  1119. है बंदा जानिसार तेरा।
  1120. =================================
  1121. दिल पे एक तरफ़ा क़यामत करना...

  1122. दिल पे एक तरफ़ा क़यामत करना;
  1123. मुस्कुराते हुए रुखसत करना;

  1124. अच्छी आँखें जो मिली हैं उसको;
  1125. कुछ तो लाजिम हुआ वहशत करना;

  1126. जुर्म किसका था, सज़ा किसको मिली;
  1127. अब किसी से ना मोहब्बत करना;

  1128. घर का दरवाज़ा खुला रखा है;
  1129. वक़्त मिल जाये तो ज़ह्मत करना।
  1130. =================================
  1131. माने जो कोई बात, तो एक बात बहुत है;
  1132. सदियों के लिए पल की मुलाक़ात बहुत है;

  1133. दिन भीड़ के पर्दे में छुपा लेगा हर एक बात;
  1134. ऐसे में न जाओ, कि अभी रात बहुत है;

  1135. महीने में किसी रोज़, कहीं चाय के दो कप;
  1136. इतना है अगर साथ, तो फिर साथ बहुत है;

  1137. रसमन ही सही, तुमने चलो ख़ैरियत पूछी;
  1138. इस दौर में अब इतनी मदारात बहुत है;

  1139. दुनिया के मुक़द्दर की लक़ीरों को पढ़ें हम;
  1140. कहते है कि मज़दूर का बस हाथ बहुत है;

  1141. फिर तुमको पुकारूँगा कभी कोहे 'अना' से;
  1142. ऐ दोस्त अभी गर्मी-ए-हालात बहुत है।
  1143. =================================
  1144. मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में;
  1145. रहा करती है शादाबी ख़ज़ाँ के भी महीनों में;

  1146. ज़िया-ए-महर आँखों में है तौबा मह-जबीनों में;
  1147. के फ़ितरत ने भरा है हुस्न ख़ुद अपना हसीनों में;

  1148. हवा-ए-तुंद है गर्दाब है पुर-शोर धारा है;
  1149. लिए जाते हैं ज़ौक-ए-आफ़ियत सी शय सफीनों में;

  1150. मैं उन में हूँ जो हो कर आस्ताँ-ए-दोस्त से महरूम;
  1151. लिए फिरते हैं सजदों की तड़प अपनी जबीनों में;

  1152. मेरी ग़ज़लें पढ़ें सब अहल-ए-दिल और मस्त हो जाएँ;
  1153. मय-ए-जज़्बात लाया हूँ मैं लफ़्ज़ी आब-गीनों में।
  1154. =================================
  1155. ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी;
  1156. जारी है अभी गर्दिश-ए-पा सहमी हुई सी;

  1157. दिल टूट तो जाता है पे गिर्या नहीं करता;
  1158. क्या डर है के रहती है वफ़ा सहमी हुई सी;

  1159. उठ जाए नज़र भूल के गर जानिब-ए-अफ़्लाक;
  1160. होंटों से निकलती है दुआ सहमी हुई सी;

  1161. हाँ हँस लो रफ़ीक़ो कभी देखी नहीं तुम ने;
  1162. नम-नाक निगाहों में हया सहमी हुई सी;

  1163. तक़सीर कोई हो तो सज़ा उम्र का रोना;
  1164. मिट जाएँ वफ़ा में तो जज़ा सहमी हुई सी;

  1165. है 'अर्श' वहाँ आज मुहीत एक ख़ामोशी;
  1166. जिस राह से गुज़री थी क़ज़ा सहमी हुई सी।
  1167. =================================
  1168. वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें;
  1169. वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें;

  1170. ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई;
  1171. ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें;

  1172. कभी न ख़त्म किया मैं ने रोशनी का मुहाज़;
  1173. अगर चिराग़ बुझा, दिल जला लिया मैनें;

  1174. कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था;
  1175. वो तीर अपने कलेजे पे खा लिया मैनें;

  1176. "क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था;
  1177. उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें।
  1178. =================================
  1179. सफ़ीना ग़र्क़ हुआ मेरा यूँ ख़ामोशी से;
  1180. के सतह-ए-आब पे कोई हबाब तक न उठा;

  1181. समझ न इज्ज़ इसे तेरे पर्दा-दार थे हम;
  1182. हमारा हाथ जो तेरे नक़ाब तक न उठा;

  1183. झिंझोड़ते रहे घबरा के वो मुझे लेकिन;
  1184. मैं अपनी नींद से यौम-ए-हिसाब तक न उठा;

  1185. जतन तो ख़ूब किए उस ने टालने के मगर;
  1186. मैं उस की बज़्म से उस के जवाब तक न उठा।
  1187. =================================
  1188. हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू;
  1189. कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू;

  1190. बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से;
  1191. जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू;

  1192. मेरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ;
  1193. तेरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू;

  1194. मैं जानता हूँ के दुनिया तुझे बदल देगी;
  1195. मैं मानता हूँ के ऐसा नहीं बज़ाहिर तू;

  1196. हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है;
  1197. ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू;

  1198. 'फ़राज़' तूने उसे मुश्किलों में डाल दिया;
  1199. ज़माना साहिब-ए-ज़र और सिर्फ़ शायर तू।

  1200. =================================


  1201. दिल को जब अपने गुनाहों का ख़याल आ जायेगा;
  1202. साफ़ और शफ्फ़ाफ़ आईने में बाल आ जायेगा;

  1203. भूल जायेंगी ये सारी क़हक़हों की आदतें;
  1204. तेरी खुशहाली के सर पर जब ज़वाल आ जायेगा;

  1205. मुसतक़िल सुनते रहे गर दास्ताने कोह कन;
  1206. बे हुनर हाथों में भी एक दिन कमाल आ जायेगा;

  1207. ठोकरों पर ठोकरे बन जायेंगी दरसे हयात;
  1208. एक दिन दीवाने में भी ऐतेदाल आ जायेगा;

  1209. बहरे हाजत जो बढ़े हैं वो सिमट जायेंगे ख़ुद;
  1210. जब भी उन हाथों से देने का सवाल आ जायेगा।
  1211. =================================
  1212. हर एक लम्हे की रग में दर्द का रिश्ता धड़कता है;
  1213. वहाँ तारा लरज़ता है जो याँ पत्ता खड़कता है;

  1214. ढके रहते हैं गहरे अब्र में बातिन के सब मंज़र;
  1215. कभी एक लहज़ा-ए-इदराक बिजली सा कड़कता है;

  1216. मुझे दीवाना कर देती है अपनी मौत की शोख़ी;
  1217. कोई मुझ में रग-ए-इज़हार की सूरत फड़कता है;

  1218. फिर एक दिन आग लग जाती है जंगल में हक़ीक़त के;
  1219. कहीं पहले-पहल एक ख़्वाब का शोला भड़कता है;

  1220. मेरी नज़रें ही मेरे अक्स को मजरूह करती हैं;
  1221. निगाहें मुर्तकिज़ होती हैं और शीशा तड़कता है।
  1222. =================================

  1223. रूह प्यासी कहाँ से आती है;
  1224. ये उदासी कहाँ से आती है;

  1225. दिल है शब दो का तो ऐ उम्मीद ;
  1226. तू निदासी कहाँ से आती है;

  1227. शौक में ऐशे वत्ल के हन्गाम;
  1228. नाशिफासी कहाँ से आती है;

  1229. एक ज़िन्दान-ए-बेदिली और शाम;
  1230. ये सबासी कहाँ से आती है;

  1231. तू है पहलू में फिर तेरी खुशबू;
  1232. होके बासी कहाँ से आती है।
  1233. =================================
  1234. ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था;
  1235. दिल का आलम भी बे-मिसाल सा था;

  1236. अक्स मेरा भी आइनों में नहीं;
  1237. वो भी कैफ़ियत-ए-ख़याल सा था;

  1238. दश्त में सामने था ख़ेमा-ए-गुल;
  1239. दूरियों में अजब कमाल सा था;

  1240. बे-सबब तो नहीं था आँखों में;
  1241. एक मौसम के ला-ज़वाल सा था;

  1242. ख़ौफ़ अँधेरों का डर उजालों से;
  1243. सानेहा था तो हस्ब-ए-हाल सा था;

  1244. क्या क़यामत है हुज्ला-ए-जाँ में;
  1245. उस के होते हुए मलाल सा था;

  1246. जिस की जानिब 'अदा' नज़र न उठी;
  1247. हाल उस का भी मेरे हाल सा था।
  1248. =================================

  1249. तुझ से अब और मोहब्बत नहीं की जा सकती;
  1250. ख़ुद को इतनी भी अज़िय्यत नहीं दी जा सकती;

  1251. जानते हैं कि यक़ीं टूट रहा है दिल पर;
  1252. फिर भी अब तर्क ये वहशत नहीं की जा सकती;

  1253. हवस का शहर है और उस में किसी भी सूरत;
  1254. साँस लेने की सहूलत नहीं दी जा सकती;

  1255. रौशनी के लिए दरवाज़ा खुला रखना है;
  1256. शब से अब कोई इजाज़त नहीं ली जा सकती;

  1257. इश्क़ ने हिज्र का आज़ार तो दे रखा है;
  1258. इस से बढ़ कर तो रिआयत नहीं दी जा सकती।
  1259. =================================
  1260. तू भी तो एक लफ़्ज़ है इक दिन मिरे बयाँ में आ;
  1261. मेरे यक़ीं में गश्त कर मेरी हद-ए-गुमाँ में आ;

  1262. नींदों में दौड़ता हुआ तेरी तरफ़ निकल गया;
  1263. तू भी तो एक दिन कभी मेरे हिसार-ए-जाँ में आ;

  1264. इक शब हमारे साथ भी ख़ंजर की नोक पर कभी;
  1265. लर्ज़ीदा चश्म-ए-नम में चल जलते हुए मकाँ में आ;

  1266. नर्ग़े में दोस्तों के तू कब तक रहेगा सुर्ख़-रू;
  1267. नेज़ा-ब-नेज़ा दू-ब-दू-सफ़्हा-ए-दुश्मनान में आ;

  1268. इक रोज़ फ़िक्र-ए-आब-ओ-नाँ तुझ को भी हो जान-ए-जहाँ;
  1269. क़ौस-ए-अबद को तोड़ कर इस अर्सा-ए-ज़ियाँ में आ।
  1270. =================================
  1271. छेड़ने का तो मज़ा तब है कहो और सुनो;
  1272. बात में तुम तो ख़फ़ा हो गये, लो और सुनो;

  1273. तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुम को;
  1274. छोड़ देवेगा भला, देख तो लो, और सुनो;

  1275. यही इंसाफ़ है कुछ सोचो तो अपने दिल में;
  1276. तुम तो सौ कह लो, मेरी एक न सुनो और सुनो;

  1277. आफ़रीं तुम पे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें;
  1278. देख रोता मुझे यूँ हँसने लगो और सुनो;

  1279. बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर;
  1280. ऐसे ही ढँग से सुनाऊँ के सुनो और सुनो।
  1281. =================================
  1282. अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम ऐ सनम अच्छा;
  1283. लो हम भी न बोलेंगे ख़ुदा की क़सम अच्छा;

  1284. मश्ग़ूल क्या चाहिए इस दिल को किसी तौर; 
  1285. ले लेंगे ढूँढ और कोई यार हम अच्छा;

  1286. गर्मी ने कुछ आग और ही सीने में लगा दी; 
  1287. हर तौर घरज़ आप से मिलना है कम अच्छा;

  1288. अग़ियार से करते हो मेरे सामने बातें;
  1289. मुझ पर ये लगे करने नया तुम सितम अच्छा;

  1290. कह कर गए आता हूँ, कोई दम में मैं तुम पास; 
  1291. फिर दे चले कल की सी तरह मुझको दम अच्छा; 

  1292. इस हस्ती-ए-मौहूम से मैं तंग हूँ 'इंशा';
  1293. वल्लाह के उस से दम अच्छा।
  1294. =================================

  1295. पूछा किसी ने हाल किसी का तो रो दिए;
  1296. पानी के अक्स चाँद का देखा तो रो दिए;

  1297. नग़्मा किसी ने साज़ पे छेड़ा तो रो दिए;
  1298. ग़ुंचा किसी ने शाख़ से तोड़ा तो रो दिए;

  1299. उड़ता हुए ग़ुबार सर-ए-राह देख कर;
  1300. अंजाम हम ने इश्क़ का सोचा तो रो दिए;

  1301. बादल फ़ज़ा में आप की तस्वीर बन गए;
  1302. साया कोई ख़याल से गुज़रा तो रो दिए;

  1303. रंग-ए-शफ़क़ से आग शगूफ़ों में लग गई;
  1304. 'साग़र' हमारे हाथ से छलका तो रो दिए।
  1305. =================================

  1306. पहले सौ बार इधर और उधर देखा है;
  1307. तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है;

  1308. हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं;
  1309. हम ने उस शोख को अए दीदा-ए-तर देखा है;

  1310. आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो;
  1311. उस ने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है;

  1312. क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना;
  1313. मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है


  1314. =================================

  1315. देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना;
  1316. शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुसवा करना;

  1317. एक नज़र ही तेरी काफ़ी थी कि आई राहत-ए-जान; 
  1318. कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना; 

  1319. उन को यहाँ वादे पे आ लेने दे ऐ अब्र-ए-बहार; 
  1320. जिस तरह चाहना फिर बाद में बरसा करना; 

  1321. शाम हो या कि सहर याद उन्हीं की रख ले;
  1322. दिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना;

  1323. कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या है 'हसरत';
  1324. उन से मिलकर भी न इज़हार-ए-तमन्ना करना।
  1325. =================================

  1326. रुस्वाइयाँ ग़ज़ब की हुईं तेरी राह में;
  1327. हद है कि ख़ुद ज़लील हूँ अपनी निगाह में;

  1328. मैं भी कहूँगा देंगे जो आज़ा गवाहियाँ;
  1329. या रब यह सब शरीक थे मेरे गुनाह में;

  1330. थी जुज़वे-नातवाँ किसी ज़र्रे में मिल गई;
  1331. हस्ती का क्या वजूद तेरी जलवागाह में;

  1332. ऐ 'शाद' और कुछ न मिला जब बराये नज़्र;
  1333. शर्मिंदगी को लेके चले बारगाह में।
  1334. =================================
  1335. इस तरफ से गुज़रे थे काफ़िले बहारों के;
  1336. आज तक सुलगते हैं ज़ख्म रहगुज़ारों के;

  1337. खल्वतों के शैदाई खल्वतों में खुलते हैं;
  1338. हम से पूछ कर देखो राज़ पर्दादारों के;

  1339. पहले हँस के मिलते हैं फिर नज़र चुराते हैं;
  1340. आश्ना-सिफ़त हैं लोग अजनबी दियारों के;

  1341. तुमने सिर्फ चाहा है हमने छू के देखे हैं;
  1342. पैरहन घटाओं के, जिस्म बर्क-पारों के;

  1343. शगले-मयपरस्ती गो जश्ने-नामुरादी है;
  1344. यूँ भी कट गए कुछ दिन तेरे सोगवारों के।
  1345. =================================
  1346. कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे;
  1347. जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे;

  1348. उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा; 
  1349. यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे;

  1350. बंद रहे जिन का दरवाज़ा ऐसे घरों की मत पूछो;
  1351. दीवारें गिर जाती होंगी आँगन रह जाते होंगे;

  1352. मेरी साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएंगे;
  1353. यानी मेरे बाद भी यानी साँस लिये जाते होंगे;

  1354. यारो कुछ तो बात बताओ उस की क़यामत बाहों की;
  1355. वो जो सिमटते होंगे इन में वो तो मर जाते होंगे।
  1356. =================================
  1357. समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;
  1358. तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

  1359. तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से;
  1360. कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

  1361. तिरी यादों की ख़ुशबू खिड़कियों में रक़्स करती है;
  1362. तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

  1363. न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से;
  1364. किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं;

  1365. हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर;
  1366. 'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं।
  1367. =================================
  1368. कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम;
  1369. उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम;

  1370. रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये;
  1371. वाह री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम;

  1372. होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी;
  1373. इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम;

  1374. बेनियाज़ी को तेरी पाया सरासर सोज़-ओ-दर्द;
  1375. तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम;

  1376. भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती;
  1377. उस को भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम;

  1378. हुस्न को इक हुस्न की समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़';
  1379. मेहरबाँ नामेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम।
  1380. =================================
  1381. तुझ से अब और मोहब्बत नहीं की जा सकती;
  1382. ख़ुद को इतनी भी अज़िय्यत नहीं दी जा सकती;

  1383. जानते हैं कि यक़ीं टूट रहा है दिल पर;
  1384. फिर भी अब तर्क ये वहशत नहीं की जा सकती;

  1385. हब्स का शहर है और उस में किसी भी सूरत;
  1386. साँस लेने की सहूलत नहीं दी जा सकती;

  1387. रौशनी के लिए दरवाज़ा खुला रखना है;
  1388. शब से अब कोई इजाज़त नहीं ली जा सकती;

  1389. इश्क़ ने हिज्र का आज़ार तो दे रक्खा है;
  1390. इस से बढ़ कर तो रिआयत नहीं दी जा सकती।
  1391. =================================
  1392. जब रूख़-ए-हुस्न से नक़ाब उठा;
  1393. बन के हर ज़र्रा आफ़्ताब उठा;

  1394. डूबी जाती है ज़ब्त की कश्ती;
  1395. दिल में तूफ़ान-ए-इजि़्तराब उठा;

  1396. मरने वाले फ़ना भी पर्दा है;
  1397. उठ सके गर तो ये हिजाब उठा;

  1398. शाहिद-ए-मय की ख़ल्वतों में पहुँच;
  1399. पर्दा-ए-नश्शा-ए-शराब उठा;

  1400. हम तो आँखों का नूर खो बैठे;
  1401. उन के चेहरे से क्या नक़ाब उठा;

  1402. होश नक़्स-ए-ख़ुदी है ऐ 'एहसान';
  1403. ला उठा शीशा-ए-शराब उठा।
  1404. =================================
  1405. गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे;
  1406. गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे;

  1407. मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स;
  1408. उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे;

  1409. मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी;
  1410. मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे;

  1411. वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों;
  1412. जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे;

  1413. तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा 'क़तील';
  1414. मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे।
  1415. =================================

  1416. किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ;
  1417. सब यहाँ दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ

  1418. वो भी क्या दिन थे कि हर वहम यकीं होता था;
  1419. अब हक़ीक़त नज़र आए तो उसे क्या समझूँ;

  1420. दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे;
  1421. ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ;

  1422. ज़ुल्म ये है कि है यक्ता तेरी बेगानारवी;
  1423. लुत्फ़ ये है कि मैं अब तक तुझे अपना समझूँ

  1424. =================================

  1425. देख दिल को मेरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़;
  1426. घर है अल्लाह का ये इस की तो तामीर न तोड़;

  1427. ग़ुल सदा वादी-ए-वहशत में रखूँगा बरपा;
  1428. ऐ जुनूँ देख मेरे पाँव की ज़ंजीर न तोड़;

  1429. देख टुक ग़ौर से आईना-ए-दिल को मेरे;
  1430. इस में आता है नज़र आलम-ए-तस्वीर न तोड़;

  1431. ताज-ए-ज़र के लिए क्यूँ शमा का सर काटे है;
  1432. रिश्ता-ए-उल्फ़त-ए-परवाना को गुल-गीर न तोड़;

  1433. अपने बिस्मिल से ये कहता था दम-ए-नज़ा वो शोख़;
  1434. था जो कुछ अहद सो ओ आशिक़-ए-दिल-गीर न तोड़;

  1435. सहम कर ऐ 'ज़फ़र' उस शोख़ कमाँ-दार से कह;
  1436. खींच कर देख मेरे सीने से तू तीर न तोड़।
  1437. =================================
  1438. कितनी पी कैसे कटी रात...

  1439. कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं;
  1440. रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं;

  1441. मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ;
  1442. थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं;

  1443. आँसुओं और शराबों में गुजारी है हयात;
  1444. मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं;

  1445. जाने क्या टूटा है पैमाना कि दिल है मेरा;
  1446. बिखरे-बिखरे हैं खयालात मुझे होश नहीं।
  1447. =================================

  1448. जहाँ में हाल मेरा इस क़दर ज़बून हुआ;
  1449. कि मुझ को देख के बिस्मिल को भी सुकून हुआ;

  1450. ग़रीब दिल ने बहुत आरज़ूएँ पैदा कीं;
  1451. मगर नसीब का लिक्खा कि सब का ख़ून हुआ;

  1452. वो अपने हुस्न से वाक़िफ़ मैं अपनी अक़्ल से सैर;
  1453. उन्हों ने होश सँभाला मुझे जुनून हुआ;

  1454. उम्मीद-ए-चश्म-ए-मुरव्वत कहाँ रही बाक़ी;
  1455. ज़रिया बातों का जब सिर्फ़ टेलीफ़ोन हुआ;

  1456. निगाह-ए-गर्म क्रिसमस में भी रही हम पर;
  1457. हमारे हक़ में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ।
  1458. =================================
  1459. हर जनम में उसी की चाहत थे;
  1460. हम किसी और की अमानत थे;

  1461. उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई;
  1462. हम ग़ज़ल की कोई अलामत थे;

  1463. तेरी चादर में तन समेट लिया;
  1464. हम कहाँ के दराज़क़ामत थे;

  1465. जैसे जंगल में आग लग जाये;
  1466. हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे;

  1467. पास रहकर भी दूर-दूर रहे;
  1468. हम नये दौर की मोहब्बत थे;

  1469. इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया;
  1470. ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

  1471. दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना;
  1472. ये दिये रात की ज़रूरत थे।
  1473. =================================
  1474. कोई बिजली इन ख़राबों में घटा रौशन करे;
  1475. ऐ अँधेरी बस्तियो! तुमको खुदा रौशन करे;

  1476. नन्हें होंठों पर खिलें मासूम लफ़्ज़ों के गुलाब;
  1477. और माथे पर कोई हर्फ़-ए-दुआ रौशन करे;

  1478. ज़र्द चेहरों पर भी चमके सुर्ख जज़्बों की धनक;
  1479. साँवले हाथों को भी रंग-ए-हिना रौशन करे;

  1480. एक लड़का शहर की रौनक़ में सब कुछ भूल जाए;
  1481. एक बुढ़िया रोज़ चौखट पर दिया रौशन करे;

  1482. ख़ैर अगर तुम से न जल पाएँ वफाओं के चिराग;
  1483. तुम बुझाना मत जो कोई दूसरा रौशन करे।
  1484. =================================
  1485. तेरा चेहरा सुब्ह का तारा लगता है;
  1486. सुब्ह का तारा कितना प्यारा लगता है;

  1487. तुम से मिल कर इमली मीठी लगती है;
  1488. तुम से बिछड़ कर शहद भी खारा लगता है;

  1489. रात हमारे साथ तू जागा करता है;
  1490. चाँद बता तू कौन हमारा लगता है;

  1491. किस को खबर ये कितनी कयामत ढाता है;
  1492. ये लड़का जो इतना बेचारा लगता है;

  1493. तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है;
  1494. फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है;

  1495. 'कैफ' वो कल का 'कैफ' कहाँ है आज मियाँ;
  1496. ये तो कोई वक्त का मारा लगता है।
  1497. =================================
  1498. नज़र फ़रेब-ए-कज़ा खा गई तो क्या होगा;
  1499. हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा;

  1500. नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर;
  1501. नई सहर भी कजला गई तो क्या होगा;

  1502. न रहनुमाओं की मजलिस में ले चलो मुझको;
  1503. मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा;

  1504. ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ;
  1505. मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा;

  1506. शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारनेवालों;
  1507. ख़िज़ाँ-सिरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा;

  1508. ख़ुशी छीनी है तो ग़म का भी ऐतमाद न कर;
  1509. जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा।
  1510. =================================
  1511. तेरे कमाल की हद...

  1512. तेरे कमाल की हद कब कोई बशर समझा;
  1513. उसी क़दर उसे हैरत है, जिस क़दर समझा;

  1514. कभी न बन्दे-क़बा खोल कर किया आराम;
  1515. ग़रीबख़ाने को तुमने न अपना घर समझा;

  1516. पयामे-वस्ल का मज़मूँ बहुत है पेचीदा;
  1517. कई तरह इसी मतलब को नामाबर समझा;

  1518. न खुल सका तेरी बातों का एक से मतलब;
  1519. मगर समझने को अपनी-सी हर बशर समझा।
  1520. =================================
  1521. मेरी रातों की राहत, दिन के इत्मिनान ले जाना;
  1522. तुम्हारे काम आ जायेगा, यह सामान ले जाना;

  1523. तुम्हारे बाद क्या रखना अना से वास्ता कोई;
  1524. तुम अपने साथ मेरा उम्र भर का मान ले जाना;

  1525. शिकस्ता के कुछ रेज़े पड़े हैं फर्श पर, चुन लो;
  1526. अगर तुम जोड़ सको तो यह गुलदान ले जाना; 

  1527. तुम्हें ऐसे तो खाली हाथ रुखसत कर नहीं सकते;
  1528. पुरानी दोस्ती है, की कुछ पहचान ले जाना;

  1529. इरादा कर लिया है तुमने गर सचमुच बिछड़ने का;
  1530. तो फिर अपने यह सारे वादा-ओ-पैमान ले जाना;

  1531. अगर थोड़ी बहुत है, शायरी से उनको दिलचस्पी;
  1532. तो उनके सामने मेरा यह दीवान ले जाना।
  1533. =================================
  1534. बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये;
  1535. @कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये;

  1536. @करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला;
  1537. यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये;

  1538. @मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना;
  1539. ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये;

  1540. @अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए;
  1541. ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये;

  1542. @गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा;
  1543. @गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये;

  1544. @तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो 'फ़राज़';
  1545. @इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये


























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