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love shayari for true lovers 2016


दिल को तेरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है,
#और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता।
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल;
#कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा।

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#तेरे बगैर भी तो ग़नीमत है ज़िन्दगी;
खुद को गँवा कर कौन तेरी जुस्त-जू करे।

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हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू;
#कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू;

#बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से;
जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू;

#मेरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ;
तेरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू;

#मैं जानता हूँ के दुनिया तुझे बदल देगी;
मैं मानता हूँ के ऐसा नहीं बज़ाहिर तू;

हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है;
ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू;

'फ़राज़' तूने उसे मुश्किलों में डाल दिया;
ज़माना साहिब-ए-ज़र और सिर्फ़ शायर तू।

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किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
#तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ।

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#बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये;
#कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये;

#करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला;
#यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये;

मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना;
ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये;

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए;
ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये;

गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा;
गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये;

#तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो 'फ़राज़';
#इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये।

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बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये;
कि अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये;

करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला;
यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये;

मगर किसी ने हमें हमसफ़र नही जाना;
#ये और बात कि हम साथ साथ सब के गये;

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए;
#ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये;

#गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नहीं हारा;
#गिरफ़्ता दिल है मगर हौंसले भी अब के गये;

तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो 'फ़राज़';
इन आँधियों में तो प्यारे चिराग सब के गये।

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@जिसको भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है 'फ़राज़';
#सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का।

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#दुनिया में मत ढूंढ नाम ए वफ़ा 'फ़राज़';
#दिलों से खेलते हैं लोग बना के हमसफ़र अपना।
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#किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ 'फ़राज़' कब तक;
#जो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ।



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#मोहब्बत से, इनायत से, वफ़ा से चोट लगती है;
#बिखरता फूल हूँ, मुझको हवा से चोट लगती है;
#मेरी आँखों में आँसू की तरह इक रात आ जाओ,
#तकल्लुफ़ से, बनावट से, अदा से चोट लगती है।

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इसी शहर में कई साल से मेरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं,
#उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं।

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यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं,
#मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे।

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ख़्वाब इस आँखों से अब कोई चुरा कर ले जाये;
#क़ब्र के सूखे हुए फूल उठा कर ले जाये;

#मुंतज़िर फूल में ख़ुश्बू की तरह हूँ कब से;
#कोई झोंकें की तरह आये उड़ा कर ले जाये;

#ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी;
#जो हथेली पे रची मेहंदी उड़ा कर ले जाये;

#मैं मोहब्बत से महकता हुआ ख़त हूँ मुझ को;
#ज़िन्दगी अपनी किताबों में दबा कर ले जाये;

ख़ाक इंसाफ़ है नाबीना बुतों के आगे;
रात थाली में चिराग़ों को सजा कर ले जाये।

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा;
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।

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मैं यूँ भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ;
कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाए।

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वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है;
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है;
उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से;
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है।

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@हर जनम में उसी की चाहत थे;
हम किसी और की अमानत थे;

@उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई;
हम ग़ज़ल की कोई अलामत थे;

तेरी चादर में तन समेट लिया;
@हम कहाँ के दराज़क़ामत थे;

जैसे जंगल में आग लग जाये;
हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे;

#पास रहकर भी दूर-दूर रहे;
#हम नये दौर की मोहब्बत थे;

#इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया;
#ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

#दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना;
#ये दिये रात की ज़रूरत थे।

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भूल शायद बहुत बड़ी कर ली;
#दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली;
#तुम मोहब्बत को खेल कहते हो;
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली।

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मोहब्बतों में दिखावे की...

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला;
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी ना मिला;

घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे;
बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला;

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड आया था;
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी ना मिला;

बहुत अजीब है ये कुरबतों की दूरी भी;
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी ना मिला;

खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने;
बस एक शख्स को मांगा मुझे वही ना मिला


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सिसकियाँ लेता है वजूद मेरा गालिब,
नोंच नोंच कर खा गई तेरी याद मुझे।

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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतश ग़ालिब,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।

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दुख देकर सवाल करते हो,
तुम भी गालिब, कमाल करते हो;

देख कर पुछ लिया हाल मेरा,
चलो इतना तो ख्याल करते हो;

शहर-ए-दिल मेँ उदासियाँ कैसी,
ये भी मुझसे सवाल करते हो;

@मरना चाहे तो मर नही सकते,
@तुम भी जीना मुहाल करते हो;

@अब किस-किस की मिसाल दूँ तुमको,
@तुम हर सितम बेमिसाल करते हो।

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@बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह,
@जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है।

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@ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना;
बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़-दाँ अपना।

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#कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीम-कश को;
#ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।

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#मशरूफ रहने का अंदाज़ तुम्हें तनहा ना कर दे 'ग़ालिब';
#रिश्ते फुर्सत के नहीं तवज्जो के मोहताज़ होते हैं।

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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है;
तुम्ही कहो कि ये अंदाजे-गुफ्तगू क्या है;

न शोले में ये करिश्मा न बर्क में ये अदा;
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू क्या है;

ये रश्क है कि वो होता है हमसुखन तुमसे;
#वरगना खौफे-बद-अमोजिए-अदू क्या है;

#चिपक रहा है बदन लहू से पैरहन;
#हमारी जेब को अब हाजते-रफू क्या है;

#जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा;
#कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है;

#बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता;
#वगरना शहर में ग़ालिब कि आबरू क्या है।

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#तुम न आए तो क्या सहर न हुई;
#हाँ मगर चैन से बसर न हुई;
#मेरा नाला सुना ज़माने ने;
#एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।

शब्दार्थ:
सहर = सुबह
बसर = गुजरना
नाला = रोना-धोना, शिकवा

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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना;
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना


दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं;
सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं;

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे;
हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं;

बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आश्ना भी नहीं;
इसी में खुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं;

ये मैकदा है, वो मस्जिद है, वो है बुत-खाना;
कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं;

हमारे शहर के मंजर न देख पायेंगे;
यहाँ के लोग तो आँखों में ख्वाब रखते हैं।

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उसकी कत्थई आँखों में...

उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब;
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब;

जिस दिन से तुम रूठीं मुझ से रूठे-रूठे हैं;
चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब;

मुझसे बिछड़ कर वह भी कहाँ अब पहले जैसी है;
फीके पड़ गए कपड़े-वपड़े, ज़ेवर-वेवर सब;

आखिर मै किस दिन डूबूँगा फ़िक्रें करते है;
कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया लंगर-वंगर सब।

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बोतलें खोल कर तो पी बरसों;
आज दिल खोल कर भी पी जाए।

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साकी और शराब  
कितनी पी कैसे कटी रात...

#कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं;
#रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं;

#मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ;
#थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं;

#आँसुओं और शराबों में गुजारी है हयात;
#मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं;

#जाने क्या टूटा है पैमाना कि दिल है मेरा;
#बिखरे-बिखरे हैं खयालात मुझे होश नहीं।

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कभी अकेले में मिल...

@​कभी अकेले में मिल कर झंझोड़ दूंगा उसे​;
​@जहाँ​-​जहाँ से वो टूटा है​ ​जोड़ दूंगा उसे;​​

​​​ @​मुझे छोड़ गया ​ ​ये कमाल है​ ​उस का​;
@​इरादा मैंने किया था के छोड़ दूंगा उसे​;

​@पसीने बांटता फिरता है हर तरफ सूरज​;
@​कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूंगा उसे​;

​@ ​मज़ा चखा के ही माना हूँ ​मैं भी दुनिया को​;
@​समझ रही थी के ऐसे ही ​छोड़ दूंगा उसे​;

​ #​बचा के रखता है​ खुद को वो मुझ से शीशाबदन​;​
#उसे ये डर है के तोड़​-​फोड़ दूंगा उसे​।

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तेरी हर बात मोहब्बत में...

#तेरी हर बात मोहब्बत में गंवारा करके;
#दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके;

#एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे;
#वो अलग हट गया आँधी को इशारा करके;

#मुन्तज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे;
#चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा करके;

#मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भंवर है जिसकी;
#तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके।

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#नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से;
#ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं


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जो मेरा दोस्त भी है...

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है;
वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है;

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ;
मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है;

#सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी;
#हमारे सामने ख्वाबों का मसला भी है;

#जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन;
#सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है;

#ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन;
#ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है।

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लोग हर मोड़ पे...

#लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं;
#इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं;

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ;
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं;

नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से;
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं;

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए;
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं।

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दोस्ती जब किसी से की जाये तो दुश्मनों की भी राय ली जाये;
मौत का ज़हर है फिज़ाओं में अब कहाँ जा कर सांस ली जाये;
बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ कि ये नदी कैसे पार की जाये;
मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे हैं आज फिर कोई भूल की जाये



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क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते;
कुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते;

अपने मर्ज़-ए-ग़म का हकीम और कोई है;
हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते;

मालूम नहीं हम से हिजाब उन को है कैसा;
औरों से तो वो शर्म ओ हया कुछ नहीं करते;

गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरत;
पर दिल को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते;

वो दिल-बरी अब तक मेरी कुछ करते हैं लेकिन;
तासीर तेरे नाले दिला कुछ नहीं करते;

करते हैं वो इस तरह 'ज़फ़र' दिल पे जफ़ाएँ;
ज़ाहिर में ये जानो के जफ़ा कुछ नहीं करते।

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हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए;
ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो ख़ुदा के लिए;

गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में;
हम आप डूबे किसी अपने आशना के लिए;

जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को;
ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए;

वो आईना है के जिस को है हाजत-ए-सीमाब;
इक इज़्तिराब है काफ़ी दिल-ए-सफ़ा के लिए;

तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल;
जो तेरे तीर का रोज़न न हो हवा के लिए;

जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-फ़ख़रूद्दीन;
तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतया के लिए।

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देख दिल को मेरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़;
घर है अल्लाह का ये इस की तो तामीर न तोड़;

ग़ुल सदा वादी-ए-वहशत में रखूँगा बरपा;
#ऐ जुनूँ देख मेरे पाँव की ज़ंजीर न तोड़;

देख टुक ग़ौर से आईना-ए-दिल को मेरे;
#इस में आता है नज़र आलम-ए-तस्वीर न तोड़;

ताज-ए-ज़र के लिए क्यूँ शमा का सर काटे है;
#रिश्ता-ए-उल्फ़त-ए-परवाना को गुल-गीर न तोड़;

अपने बिस्मिल से ये कहता था दम-ए-नज़ा वो शोख़;
#था जो कुछ अहद सो ओ आशिक़-ए-दिल-गीर न तोड़;

#सहम कर ऐ 'ज़फ़र' उस शोख़ कमाँ-दार से कह;
खींच कर देख मेरे सीने से तू तीर न तोड़।

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तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा;
शमा होगी जहाँ परवाना वहाँ पहुँचेगा।

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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में;
किसकी बनी है आलम-ए-ना पैदार में;
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें;
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।

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तुम न आये एक दिन...

तुम न आये एक दिन का वादा कर दो दिन तलक;
हम पड़े तड़पा किये दो-दो पहर दो दिन तलक;

#दर्द-ए-दिल अपना सुनाता हूँ कभी जो एक दिन;
#रहता है उस नाज़नीं को दर्द-ए-सर दो दिन तलक;

#देखते हैं ख़्वाब में जिस दिन किस की चश्म-ए-मस्त;
#रहते हैं हम दो जहाँ से बेख़बर दो दिन तलक;

#गर यक़ीं हो ये हमें आयेगा तू दो दिन के बाद;
#तो जियें हम और इस उम्मीद पर दो दिन तलक;

#क्या सबब क्या वास्ता क्या काम था बतलाइये;
#घर से जो निकले न अपने तुम "ज़फ़र" दो दिन तलक।

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#क्या कुछ न किया है और क्या कुछ नहीं करते;
कुछ करते हैं ऐसा ब-खुदा कुछ नहीं करते;
अपने मर्ज़-ए-गम का हकीम और कोई है;
हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते।

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तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें;
#हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया।

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#सब मिटा दें दिल से, हैं जितनी कि उस में ख़्वाहिशें;
गर हमें मालूम हो कुछ उस की ख़्वाहिश और है।

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#मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी;
शहर में जिस दिन क़त्ल हुआ मैं ईद मनाई लोगों ने#

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