Sunday, 25 June 2017

प्यार की खातिर तो काँटे भी कबूल हैं


उनसे मिलने की जो सोचें अब वो ज़माना


मेरे कहने पर कहाँ उसने चले आना है


जब ग़ज़लों में हमने उनकी बेवफाई


चाँद सारा आसमान राह में बिछा देता


आँखों को सुलाने में कुछ देर तो लगती


दिल ना चाह कर भी खामोश रह जाता है


वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है