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GAZAL HI गज़ल

इन सहराओं में भी झीलें निकल आएँगी ...
अरमां तो रखें कि फ़िज़ायें बदल जाएँगी ...

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इस अलाव में सुकून भी है चिंगारी भी ...
हाथ दूर ही रखना आस्तीने जल जाएँगी ...

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बस चन्द जाम बचे है यारों, यूँ ना छोड़ो ...
सेहर होते ही हँसती महफिलें ढल जाएँगी ...

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रिश्तों की पुरानी दीवारें अब गिरने को हैं ...
मैने सोचा था कुछ बरस और चल जाएँगी ...

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आप भी कभी उन यादों का दीदार किया करें ...
ज़ेहन मे पड़ी पड़ी सड़ जाएँगी, गल जाएँगी ...

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ज़िंदगी में उम्मीदों का गिरना उठना लगा रहेगा ...
गिरेंगी कई बार, कई बार यूँ ही संभल जाएँगी ...




हर एक गूँज से बेख़बर हैं सन्नाटो से घिरे नज़ारे...
सब सिमटे हैं अपने दायरे में कौन किसे पुकारे...

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खौफनाक वीराने में अकेली टहल रही है चाँदनी...
रात रो रही है रेत पर सिर रखकर सागर किनारे...

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हमने देखा एक बस्ती बड़ी खूबसूरत है उस ओर...
कोई जाए भी और जल्दी से उसकी नज़र उतारे...

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है क़ुदरत भी आख़िर अपने काम में बड़ी शातिर...
खामोश साज़िशों में छुपाए रखती है हादसे सारे...

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अब देख रहे हैं ज़ख़्म सारे बैठ कर इस बंजर में…
खैर हमने ही तो उगाए थे काँटे जलाकर बहारें...

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उम्मीदों की सुबह गुमसुम है सूरज के इंतज़ार में...
कब अंधेरे की दीवार पर होगी रोशनी की दरारें..




ये सफ़र एक दश्त सा वीरान लगता है ...
हर कदम एक नया इम्तेहान लगता है ...
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सच बोलकर लोगों ने ये रास्ते दिखाये ...
झूठ बोलना अब मुझे आसान लगता है ...
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चूल्हेल की ठंडी आग बस्तियाँ जला गई ...
तुम्हारा शहर तो अब श्मशान लगता है ...
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तेरे आँसुओं को पहचानने लगा हूँ जबसे ...
तेरा मुस्कुराना मुझे ऐहसान लगता है ...
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भीड़ में सब आए थे भीड़ में ही खो गये ...
यहाँ हर चेहरा मुझे 'अनजान' लगता है ...
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लफ़्ज़ों की कीमत जानने वाला कोई नहीं ...
ग़ज़लें लिखना फिर मुझे बेईमान लगता है ...




तिम्रो एक मुस्कानले शहर खलबल बनाइदियो
बारम्बार याद आउने कस्तो तलतल बनाइदियो

जताततै एउटै चर्चा सुनिन्छ बजारमा
बिषयवस्तु एउटै थियो ठुलै छलफल बनाइदियो

टोलाउदै हेरि बस्दा चेहेरा सबका मलिन थिए
एकाएक आगमनले मुहार झलमल बनाइदियो

"अनायास"ब्युझन्छ राति मौका छोपेर भन्न
अगावै पुगेको लामले आँखा टलपल बनाइदियो




पढ़ रहा हूँ वेदना का व्याकरण मैं
हूँ समर में आज भी हर एक क्षण मैं

सभ्यता के नाम पर ओढ़े गए जो
नोच फेकूं वो मुखौटे, आवरण मैं

रच रहा हूँ आज मैं कोई ग़ज़ल फिर
खोल बाहें कर रहा हूँ दुःख गृहण मैं

ये निरंतर रतजगे, चिन्तन, ये लेखन
कर रहा हूँ अपनी ही वय का क्षरण मैं

पीछे - पीछे अनगिनत हिंसक शिकारी
प्राण लेकर भागता सहमा हिरण मैं

शक्ति का हूँ पुंज, एटम बम सरीखा
देखने में लग रहा हूँ एक कण मैं

है मेरी पहचान, है अस्तित्व मेरा
कर नही सकता किसी का परिक्रमण मैं

ब्रह्म का वरदान हूँ, नूर-ए-ख़ुदा हूँ
व्योम का हूँ तत्व, धरती का लवण मैं

क्या जटायू से भी हूँ 'आलोक' निर्बल
देखता हूँ मौन रह सीता हरण मैं





क्यों डर का अहसास है, जब तू नहीं मेरे पास है,
कामयाबी की तलाश है, पर तू नहीं मेरे पास हैI

ये कौन सा अहसास है, ये कैसे जज्बात है,
ये खामोशियो की फ़रियाद है, या यही हालत है?

ख्वाब जब देखू मै, बनती क्यों नई बात है,
टूटता है जो मेरे अंदर, वो क्यों इतना खास हैI

ज़िन्दगी गुजरती रही, ज़िन्दगी की तलाश मै,
ज़िन्दगी न बन सकी, अब ज़िन्दगी से आस हैI

क्यों डर का अहसास है, जब तू नहीं मेरे पास है,
कामयाबी की तलाश है, पर तू नहीं मेरे पास है




साहब !!! गरीबी टेकती है।
घर-जिस्म औरत बेचती है।

भूखा मरा लड़का कि जिसका
वो आँख किसको ढूंढती है?

हाँ राम आएंगे बचाने
सीता यही बस सोंचती है

औ जिस्म के बाजार में फिर
सीता मर्यादा तोड़ती है।

इंसानियत रोने लगी तब
जब दर्द से वो देखती है।

लड़की कि जिसकी सिग्नलों पे
पैदा हो सिक्के मांगती है।




मजहबों के नाम पर ही देश जब बटने लगा।
तब सियासत का वो सिक्का दौड़ के चलने लगा।

मौत का मंजर हैं फैला क्या शहर में आ गया?
या कि दुश्मन अब हमीं से दोसती करने लगा?

दफ़्न है हर मोड़ पर रे लाश ये किसकी कहो?
घर मेरा श्मशान में ही बोल क्या बनने लगा।

बस जलालत की हदों में है सुखी वो आदमी
जो औरों के खून से इतिहास को लिखने लगा।

यार की नजरों में चढ़ने के हि खातिर अब सुनो
राजनीती का वो चबुका पीठ पर दिखने लगा।

क्या कहूँ औरों को 'तेजस' साँस मेरी ही रुकी
रोटि कपड़ा औ मकां में खुश मैं होने लगा।






अब अरे साँपो सुनो चुप ,जीभ कटनी चाहिए।
हो अगर जीवित कहीं ,तलवार उठनी चाहिए।

मैं न कहता तुम बुरे औ कह न सकता मैं भला
देश द्रोही को मग़र फिर आग मिलनी चाहिए।

अब शहर में जा बता दो उठ रहे हैं ज़लज़ले
ताक पर इज्जत हमारी वो न बिकनी चाहिए।

क्यों हमारे ही घरो में सर पे चढ़ वो नाचते
आँख खोलो कायरों औकात दिखनी चाहिए।

बाप के आगे सुनो की छोकरे जब बोलते !!
बस तभी बातें कि सारी यूँ न टलनी चाहिए।

जो इमारत खुद कहे मैं ही हूँ कातिल देश की
देखते वीरों कि क्या ? बुनियाद हिलनी चाहिए।

चाटुकारों को सियासी बात करनी है अभी
माँ बिके बिकती रहे बस जेब भरनी चाहिए।

क्या कहूँ "तेजस" अभी धिक्कार है उन पर मुझे
बस खड़े बाज़ार कर गोली कि चलनी चाहिए।






कभी उन्माद में बैठे कभी अवसाद में बैठे
बड़ा ही तंग थे यारों कि उनकी याद में बैठे

अरे मजबूर हमको कर दिया उसने सुनो'तेजस'
निकाले दिल गली क्यों आज भी फरियाद में बैठे

किसी की तब नही सुनते असर देखो हुआ है क्या
हमारे यार ही अब तो यहाँ प्रतिवाद में बैठे




लोग कहते हैं कि कहने दो
आँख के दरिया को बहने दो

अब मिला आँखे हमीं से सुन
शक्ल सीने में उतरने दो

होश में आने कि जल्दी क्यों?
और थोड़ी यूँ गुजरने दो..

बन गया हूँ हूबहू शीशा
मौत से ही अब लिपटने दो

क्यों मरे हम मोहिनी पर ही
भूल को अब बस सुधरने दो

भूलना भी है कठिन तुझको
पर ज़रा कोशिश तो करने दो

उफ़ जहां की उलझने 'तेजस'
प्यार को पन्नों में रहने दो




है कि यादें वो कहानी अब कि मिटती जा रही
लोग वैसे ही मग़र ,नीयत बदलती जा रही

अब शहर की बस्तियों में लाश है चलते दिखे
झूठ में जीकर सुनो हस्ती सिमटती जा रही

रे यहाँ रिश्ते बिके है नुक्कड़ों के ढेर पे
सरसराती जिंदगी में साँस रुकती जा रही

आप आपा खो रहे हैं इन्द्रियों के जाल में
वासनाओं की जड़े फिर से पनपती जा रही

अब न मिलती है मुझे पल्लू में लिपटी माँ मिरी
इस दिखावे के समय में वो भि छिपती जा रही

लोग पूछे हैं शहर के जात बतलाओ ज़रा
जात पर ही अब हमारी बात गिरती जा रही

देख करके डर रहा हूँ इस जहां की उलझने
रेत मुट्ठी से मग़र फिर भी फिसलती जा रही

धूल खाती अब पड़ी है लेखनी कवि की सुनो
चाटुकारों से हि "तेजस" वो भि लुटती जा रही



बहुत टूटे बहुत रोये इरादे कह न पाये थे
हमारे दिल के अंगारे कि आँसू बह न पाये थे।

हमारी ही सुनो चुप्पी हमे ही तोड़ देती थी,
बसे आँखों के सपने रे कि अब तक ढह न पाये थे।

तुम्हारी ही इबादत की सुनो इस दिल ने आखिर तक
कि दिल के इस घरौंदे में वो शिव भी रह न पाये थे।

यहाँ के लोग कहते हैं तुम अगले जन्म आओगी
मगर लम्बी जुदाई सुन सुनो हम सह न पाये थे।

निकली रश्म की रेखा तुम्हारा नाम लेकर के
सजल नेत्रों कि दीवारों में तुमको गह न पाये थे।





जहाँ मेरा बसेरा है वहाँ के लोग बिकते हैं।
अरे तुमसे ही कहता हूँ कि वो तुमसे ही दिखते हैं।

जरूरत पर जहाँ मिलती दुआएँ भी हैं सिक्को से
चला है धर्म का ठेका कि ठेकेदार रहते हैं।

अरे उछली कि इज्जत अब सरे बाज़ार कवियों की
सियासी मंच पर चढ़ के दिखे वो सिक्के चुनते हैं।

लगाते हो सुनो बोली कि उस रतनाम की यूँ ही
यहाँ सब हुस्न के ताले कि सिक्कों से ही खुलते हैं

झुकी है बाप की पगड़ी लुटे हैं रत्न आँसू के
अरे दुल्हन से ज्यादा अब हमे सिक्के ही जँचते हैं।

बड़ा ही दर्द होता है मुझे देखे ज़माने को
मुझे लगता यहाँ रिश्ते सिर्फ सिक्कों से चलते हैं।

नसीहत में मुझे दे के कि वो इक बात कहती थी
कि गीतों से नही "तेजस"सुनो रे झोले भरते हैं।



मेरे भोले मेरे स्वामी तुम्हारा ही सहारा है
यहाँ सब लोग छलते है तुम्हे मैंने पुकारा है।

लगा के भस्म अंगो पर चढ़ा के भांग आ जाओ
चलो दौड़े चले आओ कि डरता मन बिचारा है।

गले में सांप है लटका बजे हाथो में डमरु डम
जटाओं से बही गंगा कि तरता जग हमारा है।

तुम्हारे पास जो आता कभी खाली नही जाता
बड़ी ही आस लेकर के तुम्हे मैंने निहारा है।

बनारस के सुनो भोले मेरी आँखे तरसती हैं
जहाँ रहते कि तुम भोले वहीं सुरसरि किनारा है।

कहो कैसे बुलाये हम अघोरी को सुनो "तेजस"
अरे शमशान में ही करता जो अपना गुजारा है।





बदलते लोग अक्सर ही बदलना उनकी फितरत है।
कई दरपन में जा करके संवरना उनकी फितरत है।

मिलाकर हाँथ हमसे वो हमें सीने लगाते है।
मुहब्बत के इरादे पर मुकरना उनकी फितरत है।

सियासत है यहाँ फैली यहां पर सब बदलते है।
नमक ज़ख्मों पे अक्सर ही छिड़कना उनकी फितरत है।

गुज़र कर राह से वो बात सारी भूल जाता है।
सभी कुछ जान कर अनजान बनना उनकी फितरत है

कहाँ जाएं कहो "तेजस" तुम्हीं बचकर जमाने में
जहां जाऊं वहीं दिल में उतरना उनकी फितरत है।




अनसुलझे सवाल कुछ तो सुलझा जाते,
एक बार तो अपनी झलक दिखा जाते।

जैसे तुमने अपने मन को समझाया,
मेरे मन को भी वैसे समझा जाते।

हाल तुम्हारा लोग पूछते हैं मुझसे,
उन्हें कहूँ क्या ?इतना तो बतला जाते।

फूल बिछाने वाले सबकी राहों पर,
मेरे पथ पर काँटे ही बिखरा जाते।

मैखाने में हम फिर करने क्या जाते,
जो तुम आँखों से दो घूँट पिला जाते।

थी बच्चों की स्लेट नहीं, मेरा दिल था,
कैसे जाते जाते लिखा मिटा जाते।

मेरे जीते जी तो पास न आ पाये,
मेरी मैयत उठने पर ही आ जाते।

अनसुलझे सवाल कुछ तो सुलझा जाते,
एक बार तो अपनी झलक दिखा जाते।



"जब इस कदर दिलों में अपने दूरी है,
फिर किसलिये प्यार का स्वाँग जरूरी है?

मैं भी चलूँ राह अपनी,तुम भी अपनी,
यही तुम्हारी इच्छा है, तो पूरी है।

कोई बंधन नहीं, चलो, आजाद रहो ,
तुम्हें नहीं तो हमको क्या मजबूरी है।

पत्थर को पिघला सकती है अगर नहीं,
तो समझो पूजा आपकी अधूरी है।

नहीं निभाना है आसान मुहब्बत का,
है ये जहर, नहीं, शराब अंगूरी है।

मेरी बातों का जवाब तक दे न सके ,
इससे ज्यादा और कौन मगरूरी है।

जब इस कदर दिलों में अपने दूरी है,
फिर किसलिये प्यार का स्वाँग जरूरी है?"




सच बता दो,अब तुम्हारा हमसे नाता कौन है ?
तुम गये यदि छोड़ तुमको भी बुलाता कौन है?

भोंककर के पीठ में छूरा, चलो खुश तो हुये,
वर्ना आकर इस जहाँ में मुस्कुराता कौन है?

लाज की परतें उधड़ती जा रही हैं दिन ब दिन,
शर्मदारी का यहाँ , दावा जताता कौन है ?

हम करें अभिमान भी तो क्यूँ करें,किस पर करें?
हक जताते हैं सभी , पर काम आता कौन है ?

हौसला ये है हमारा ही, हमारी दाद दो,
नाव, वर्ना,आप अपनी ही, डुबाता कौन है ?

दोस्त में दुश्मन छिपे हैं , दुश्मनों में दोस्त हैं ,
यह हकीकत है , मगर पहचान पाता कौन है ?

एक हम ही हैं कि ढोते फिर रहे हैं , अन्यथा,
लाश अपनी अपने कंधे पर उठाता कौन है ?

"वह नदी के तीर पर बैठा हुआ 'गौरव' कहो,
भर उदासी में, विरह के गीत गाता,कौन है



साफ कहिये, अब तुम्हारा हमसे नाता कौन है ?
तुम गये यदि छोड़ तुमको भी बुलाता कौन है?

भोंककर के पीठ में छूरा, चलो खुश तो हुये,
वर्ना आकर इस जहाँ में मुस्कुराता कौन है?

लाज की परतें उधड़ती जा रही हैं दिन ब दिन,
शर्मदारी का यहाँ , दावा जताता कौन है ?

हम करें अभिमान भी तो क्यूँ करें,किस पर करें?
हक जताते हैं सभी , पर काम आता कौन है ?

हौसला ये है हमारा ही, हमारी दाद दो,
नाव, वर्ना,आप अपनी ही, डुबाता कौन है ?

दोस्त में दुश्मन छिपे हैं , दुश्मनों में दोस्त हैं ,
यह हकीकत है , मगर पहचान पाता कौन है ?

एक हम ही हैं कि ढोते फिर रहे हैं , अन्यथा,
लाश अपनी अपने कंधे पर उठाता कौन है ?

"वह नदी के तीर पर बैठा हुआ 'गौरव' कहो,
भर उदासी में, विरह के गीत गाता,कौन है ?




हथेली पर जान दिल में खुद्दारी रखते है..
हम तिरंगे के सामने वफादारी रखते है..

अब तो उस शख़्स को सरेआम फ़ासी दो..
जो लफ्जो में बारूद और चिंगारी रखते है..

दुश्मनो के दाँत खट्टे कर के रख देंगे..
एक-एक कतरे खून में जवानी रखते है..

नफ़रत की गन्दगी हमारा क्या बिगाड़ेगी..
घर के आगे हम भी बागवानी रखते है..

वो नर्क की आज में झुलसेंगे एक दिन..
जो शख़्स अपने दिल में बेईमानी रखते है..

तू ही है मेरी मंजिल तुझे हम पाकर दम लेंगे..
ये हौसला अब अपने दिल में खानदानी रखते है..

कोटि-कोटि नमन उन्हें ये "आशिक़" करता है..
जो अपनी शहादत का नाम हिन्दुस्तानी रखते है..




हम तेरा इन्तजार करते है..
याद तुझे बेसुमार करते है..

तुम मुझे छोड़कर चले तो गए..
हम तुझे अब भी प्यार करते है..

हमको ही बेवफ़ा कहना तेरा..
दिल के टुकड़े हज़ार करते है..

वो मेरे है तो मेरे ही रहे..
क्यों दूसरो की बात करते है..

कह दो उनसे की अब जिद्द छोड़े..
क्यों मुझे तार तार करते है..






चाँद को मुकम्मल, कर के आया है..
ये चराग़.. कई आंधियो से गुज़र के आया है..

तेल नहीं, इश्क़ का उबटन लगाया है उसने..
तभी तो चेहरा, निखर के आया है..

मेरी नहीं, मेरे रक़ीब की ख़ातिर..
मेहबूब मेरा आज, संवर के आया है..

वक्त की नज़ाकत है, या इश्क़ है मेरा..
उनकी गलियो में दिल, ठहर के आया है..

इंसानियत के दिए में, ये मज़हब का तेल..
मशाल-ऐ-दोस्ती यहाँ तक, डर-डर के आया है..







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