kavita for hindi font on life


  • कन्या पूजन करते हैं सब
  • पर कन्या ही न भाये
  • जन्में कन्या कहीं किसी के 
  • तो सब शोक मनायें
  • कन्या हुई तो दहेज की चिंता
  • पहले दिन से ही डराये
  • हो गई शादी अगर तो
  • दहेज के लिए फिर जलाये
  • नारी के बढ़ते कदम
  • किसी को भी न भायें 
  • घर बाहर सब जगह
  • विरूद्ध बात बनायें 
  • नारी से सब डरते हैं
  • पर पीछे-पीछे मरते हैं
  • संसद में कर हंगामा
  • परकटी, सीटी मार कहते हैं
  • अब भैया तुम्हीं बताओ
  • नारी कहाँ पर जाये
  • नारी के बिना ये दुनिया
  • क्या एक कदम चल पाये।




  • नेता-अभिनेता दोनों
  • हो गए एक समान
  • मंचों पर बैठकर गायें
  • एक दूजे का गान।
  • चिकनी चुपडी़ बातें करें
  • खूब करें अपना बखान
  • जनता का धन खूब लूटें
  • गायें मेरा भारत महान।
  • मँहगाई, बेरोजगारी खूब फैले
  • नेताजी सोते चद्दर तान
  • खुद खाएं मुर्ग मुसल्लम
  • जनता भुखमरी से परेशान।
  • कभी आंतक, कभी नक्सलवाद
  • ये लेते सबकी जान
  • नेताजी बस भाषण देते
  • शहीद होते जाबांज जवान। 
  • चुनाव आया तो लंबे भाषण
  • खडे़ हो गए सबके कान
  • वायदों की पोटली से
  • जनता हो रही हैरान ।
  • संसद में पहुँच नेताजी
  • बघारते अपना ज्ञान
  • अगला चुनाव कैसे जीतें
  • बस यही रहता अरमान ।



  • श्मशान
  • कंक्रीटों के जंगल में
  • गूँज उठते हैं सायरन
  • शुरू हो जाता है
  • बुल्डोजरों का ताण्डव
  • खाकी वर्दियों के बीच
  • दहशतजदा लोग
  • निहारते हैं याचक मुद्रा में
  • और दुहायी देते हैं
  • जीवन भर की कमाई का
  • बच्चों के भविष्य का
  • पर नहीं सुनता कोई उनकी
  • ठीक वैसे ही
  • जैसे श्मशान में
  • चैनलों पर लाइव कवरेज होता है
  • लोगों की गृहस्थियों के
  • श्मशान में बदलने का।




  • उसने बन्दूक उठाई , मैंने कलम 
  • उसने गोली चुनी , मैंने शब्द 
  • उसने खून बहाया , मैंने आंसूं 
  • उसने घर जलाये , मैंने दिल 
  • उसने दीपक बुझाया , मैंने उसे जलाया 
  • उसने लोगों को सुलाया , मैंने लोगों को जगाया 
  • वो बदनाम हुआ , मेरा नाम हुआ 
  • वो कैद हुआ , मैं आज़ाद हुआ 
  • उसे फांसी मिली , मुझे फांस 
  • हम दोनों एक ही तो थे 
  • बस उसने बन्दूक उठाई मैंने कलम। ..



  • खून बहाती नदियां 
  • अश्रु बहाते पेड़
  • मर गए वो मनुष्य 
  • जो अभी थे अधेड़ !
  •  
  • ईश्वर ने तो तुम्हे किया था भूषित 
  • पर तुमने की पृथ्वी प्रदूषित !
  • इतनी सारी , बनके बेचारी किधर जा रही 
  • इंसानो की भेड़
  •  
  • जो था उन्माद गगन 
  • तुम्हे देख लगता भगन
  • कायदित जो थी पवन 
  • किया तुमहीने उस नग्न !
  •  
  • कहाँ गयी वो बड़ी कुल्हाड़ी 
  • जिससे तुमने धरती फाड़ी
  • जैसे किसी सुहागन को 
  • पहना दी सफ़ेद साडी !
  •  
  • समय था जो बीत गया 
  • अब तू निश्चित पछतायेगा 
  • चल अगर तूने जीत लिया संभा 
  • पर वक्त कहाँ से लाएगा ?



  • बिखराई किरणों के फेरे 
  • मुदित- मुदित पंख सुनहरे 
  • रंग पसेरी हरी वादियां 
  • हर्षित , उज्जवल , कोमल चेहरे
  •  
  •  
  • चल ऐ इंसा उसी डगर पर , जिसमें न कोई डोर हो 
  • अब चुन ले वही रास्ता जो शांत वन की ऒर हो
  •  
  • आज फिर प्रकृति इतराई 
  • साथ छोड़ तुझे करे पराई 
  • शंख , पुष्प , धुप , जाप से 
  • किसने अब तक मुक्ति पाई
  •  
  • चल ऐ इंसा उसी डगर पर , जैसे आवारी भोर हो 
  • अब चुन ले वाही रास्ता जो शांत वन की ओर हो
  •  
  • क्रोधित मन की कर्कश वाणी 
  • खोह में दबके बैठा प्राणी 
  • वस्त्र बदल ले अब तू अपना 
  • नए रक्त से दौड़े नाड़ी
  •  
  • चल ऐ इंसा उसी डगर पर , जैसे सावन में मोर हो 
  • अब चुन ले वाही रास्ता जो शांत वन की ऒर हो



  • बिखराई किरणों के फेरे 
  • मुदित- मुदित पंख सुनहरे 
  • रंग पसेरी हरी वादियां 
  • हर्षित , उज्जवल , कोमल चेहरे
  •  
  •  
  • चल ऐ इंसा उसी डगर पर , जिसमें न कोई डोर हो 
  • अब चुन ले वही रास्ता जो शांत वन की ऒर हो
  •  
  • आज फिर प्रकृति इतराई 
  • साथ छोड़ तुझे करे पराई 
  • शंख , पुष्प , धुप , जाप से 
  • किसने अब तक मुक्ति पाई
  •  
  • चल ऐ इंसा उसी डगर पर , जैसे आवारी भोर हो 
  • अब चुन ले वाही रास्ता जो शांत वन की ओर हो
  •  
  • क्रोधित मन की कर्कश वाणी 
  • खोह में दबके बैठा प्राणी 
  • वस्त्र बदल ले अब तू अपना 
  • नए रक्त से दौड़े नाड़ी
  •  
  • चल ऐ इंसा उसी डगर पर , जैसे सावन में मोर हो 
  • अब चुन ले वाही रास्ता जो शांत वन की ऒर हो
  •  



  • यह वो खाना है , जिसमें अमृत समाया है !
  • जाने कितनो दिनो बाद यह मौका आया है
  • दाल , चावल , सब्ज़ी , रोटी और हलवा भी बनाया है !
  • माँ तूने बचपन में एक - एक कौर मुश्किल से खिलाया था
  • आंचल में अपने तूने दूध पिलाया था !
  • माँ किधर है वो नींबू का आचार
  • जिसके स्वाद का मामा जी करते थे प्रचार
  • कैसे थे वो दिन , क्यूं बदल गये विचार ?
  • कितने दिनो बाद आज माँ के हांथो का खाना आया है
  • यह वो खाना है , जिसमें अमृत समाया है
  • माँ किधर है वो आंवले का मुरब्बा
  • जिसका हरे कलर का था डब्बा
  • जाने कितने दिनो बाद आज मैने देशी घी ख़ाया है
  • यह वो खाना है , जिसमें अमृत समाया है !
  • ख्वाहिश मेरी यही है , यही खाना खाता जाऊं
  • ऋडी नही , भिकारी हूँ फिर भी कर्ज़ चुकता जाऊं
  • हो ईश्वर तुम , मानता हूँ
  • जिसमें ब्रह्माड समाया है
  • जाने कितने दिनो बाद , आज माँ के हांथो का खाना खाया है
  • यह वो खाना है , जिसमें अमृत समाया है !


  • तुम्हारे फूलों ने जब 
  • मेरी सुबह की पहली साँसें महकायीं 
  • मैंने चाहा था, 
  • उसी वक्त तितली बन जाऊँ 
  • मंडराऊँ खूब 
  • उन ख़ुशबू भरे खिलखिलाते रंगों पर 
  • बहकूँ सारा दिन उसी की महक से 
  • महकूँ सारी रात उसी की लहक से 
  • खुद को बटोरकर 
  • उस गुलदस्ते का हिस्सा बन जाऊँ 
  • अपने घर को महकाऊँ 
  • पड़ी रहूँ दिन रात उसे लपेटे 
  • बिखेरूँ 
  • या सहेजूँ उसकी पंखुड़ियाँ 
  • सजा लूँ उससे अपने अस्तित्व को 
  • या सज लूँ मैं 
  • कि वो हो 
  • या ये 
  • मैं चाह रही हूँ अब भी 
  • अपनी पंक्तियों की शुरुआत 
  • जो हो अंत से अनजान।     



  • एक आकार बन 
  • मेरे मानस में तुम्हारा स्थापन 
  • मुझे ठहरा गया . 

  • न अब कोई प्रतीक्षा है 
  • न भय है तुम्हारे जाने का. 

  • मेरी दीवारें भी 
  • अब तुम्हें खूब पहचानती हैं 
  • महका करती हैं वो 
  • तुम्हारी खुश्बू की भांति और मुझे नहलाती है 

  • मेरी बन्द पलकों पर 
  • वायू का सा एक थक्का 
  • जब 
  • तुम – सा  स्पर्श करने को 
  • मांगता है मेरी अनुमति 
  • मैं सहज हीं सर हिला देती हूँ 

  • मेरे सार में विलीन हो जाता है 
  • तुम्हारे अहसास और आवश्यकता का अनुपात 

  • अब तुम सदा मेरे पास हो 
  • उदभव से लेकर 
  • समाहित होने तक.




  • क्षणिक भ्रमित प्यार पाकर तुम क्या करोगे? 
  • आकाशहीन-आधार पाकर तुम क्या करोगे? 

  • तुम्हारे हीं कदमों से कुचली, रक्त-रंजित भयी, 
  • सुर्ख फूलों का हार पाकर तुम क्या करोगे? 

  • जिनके थिरकन पर न हो रोने हँसने का गुमां 
  • ऐसी घुंघरु की झनकार पाकर तुम क्या करोगे? 

  • अभिशप्त बोध करता हो जो देह तुम्हारे स्पर्श से, 
  • उस लाश पर अधिकार पाकर तुम क्या करोगे? 

  • तुम जो मूक हो, कहीं बधिर, तो कुछ अंध भी 
  • मेरी कथा का सार पाकर तुम क्या करोगे?

  •  



  • हे बादल! 
  • अब मेरे आँचल में तृणों की लहराई डार नहीं, 
  • न है तुम्हारे स्वागत के लिये 
  • ढेरों मुस्काते रंग 
  • मेरा ज़िस्म 
  • ईंट और पत्थरों के बोझ के तले 
  • दबा है। 
  • उस तमतमाये सूरज से भागकर 
  • जो उबलते इंसान इन छतों के नीचे पका करते हैं 
  • तुम नहीं जानते... 
  • कि एक तुम ही हो 
  • जिसके मृदु फुहार की आस रहती है इन्हें... 
  • बादल! तुम बरस जाना... 
  • अपनी ही बनाई कंक्रीट की दुनिया से ऊबे लोग 
  • अपनी शर्म धोने अब कहाँ जायें?      

  •  


  • इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे 
  • ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे! 
  • कोई नेह नहीं कोई सेज नहीं 
  • कोई चांदी की पाजेब नहीं 
  • बेकरार रात का चाँद नहीं 
  • कोई सपनों का सामान नहीं 
  • इन पत्तों की झनकार तले 
  • किस थाप-राग मे हृदय घुले 
  • ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे! 
  • न भाषा कोई के कह दूँ मैं 
  • न आग-आह जो सह लूँ मैं 
  • विकल बड़ा यह श्वास सा 
  • शब्दहीन विचलित आस सा 
  • जहाँ इंद्रधनुष व क्षितिज मिले 
  • कुछ ऐसी जगह वह पले बढ़े 
  • ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे! 
  • इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे 
  • ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!



  • तमतमाये सूरज ने मेरे गालों से लिपटी बूंदें सुखा डालीं, 
  • ज़िन्दगी तूने जो भी दिया...उसका ग़म अब क्यों हों? 
  • मैं जो हूँ 
  • कुछ दीवारों और काँच के टुकड़ों के बीच 
  • जहाँ चन्द उजाले हैं 
  • कुछ अंधेरे घंटे भी 
  • कुछ खास भी नहीं 
  • जिसमें सिमटी पड़ी रहूँ 
  • खाली सड़क पर 
  • न है किसी राहगीर का अंदेशा 
  • फिर भी तारों से डरती हूँ 
  • कि जाने 
  • मेरे आँचल को क्या प्राप्त हो? 
  • फिर भी 
  • हवा तो है! 
  • मेरी खिड़की के बाहर 
  • उड़ती हुई नन्हीं चिड़ियों की कतार भी है। 
  • मेरे लिये 
  • ठहरी ज़मीं है 
  • ढाँपता आसमां है 
  • ऐ ज़िन्दगी 
  • तेरे हर लिबास को अब ओढ़ना है 
  • तो उनके रंगों में फ़र्क करने का क्या तात्पर्य?  




  • तुम ख्याल बन, 
  • मेरी अधजगी रातों में उतरे हो। 
  • मेरे मुस्काते लबों से लेकर... 
  • उँगलियों की शरारत तक। 
  • तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में, 
  • कभी बिखरे हो खुशबू बनकर.. 
  • जिसे अपनी देह से लपेट, आभास लेती हूँ तुम्हारे आलिंगन का। 
  • जाने कितने रूप छुपे हैं तुम्हारे, मेरी बन्द पलकों के कोनों में... 
  • जाने कई घटनायें हैं और गढ़ी हुई कहानियाँ... 
  • जिनके विभिन्न शुरुआत हैं 
  • परंतु एक ही अंत 
  • स्वप्न से लेकर ..उचटती नींद तक 
  • मेरे सर्वस्व पर तुम्हारा एकाधिपत्य।



  • हैपी बर्थ डे स्वतंत्र भारत. 
  • यादों और वादों के छिछले मंच पर 
  • स्वागत है तुम्हारा। 
  • देखो न ! 
  • तुम्हारे स्वागत में 
  • इस कोने से उस कोने तक 
  • किस करीने से उल्टी लटकी हैं 
  • हरी नीली नारंगी रंगी हुई 
  • हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की झंडियाँ 
  • सुनों! 
  • इन बैलूनों का विस्फोट 
  • इन गिफ्ट पैकेटों में कुलबुलाती 
  • नारों की प्रतिध्वनियाँ। 
  • आओ! 
  • मुँह फुलाओ, 
  • फूँक की औपचारिकता निभाओ। 
  • ये साठों मोमबत्तियाँ 
  • पहले से ही फुंकी हुई हैं। 
  • अब, 
  • केक काटो। 
  • देखो न! 
  • सब के सब 
  • इसी इन्तज़ार मे मुँह बाए खड़े हैं 
  • निगलने के लिये। 
  • ध्यान रखना! 
  • केक पर सजे अपेक्षाओं के थक्के 
  • जैसे सबके हिस्से मे जायें। 
  • कोई डर नहीं 
  • ये आँतें सब पचा लेती हैं... 
  •      इतिहास 
  •            जन्म 
  •                नाम 
  •                   कवितायें 
  •                         संघर्ष 
  •                             रक्त 
  •                                त्याग 
  •                                    अरमान 
  •                                          ... सब।        

  •  


  • ये ख़्वाबों ख्यालों विचारों की दुनियाँ 
  • मन को दुखाते कुछ सवालों की दुनियाँ 
  • उस कोने पड़ी एक शराब की बोतल 
  • इस कोने पड़ी खाली थालों की दुनियाँ 
  • दौड़ते औ भागते रास्तों का फन्दा 
  • या तन्हा सिसकती राहों की दुनियाँ 
  • तू कौन क्या तेरा क्या उसका क्या मेरा 
  • कुछ बनते बिगड़ते सहारॊं की दुनियाँ 
  • एक कमरे में पलते सपनों की दुनियाँ 
  • एक कमरे में ख़्वाब के मज़ारों की दुनियाँ


  • उनको बिसारकर ढूँढती हूँ। 
  • पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ। 

  • खाकर ज़हर ज़िन्दगी का, 
  • शाम को, सहर ढूँढती हूँ। 

  • अपने लफ्जों का गला घोंट, 
  • उनमें असर ढूँढती हूँ। 

  • अन्तिम पड़ाव पर आज, 
  • अगला सफ़र ढूँढती हूँ। 

  • बर्दाश्त की हद देखने को, 
  • एक और कहर ढूँढती हूँ। 

  • दीवारें न हों घरों के सिवा, 
  • ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ। 

  • रंग बागों का जीवन में भरे, 
  • फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ। 

  • इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ, 
  • ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ। 

  • दिल को खुश करना चाहूँ, 
  • वादों का नगर ढूँढती हूँ। 

  • रौशनी आते आते टकरा गई, 
  • सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ। 

  • छोड़ जाय मेरे आस का मोती, 
  • किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ। 

  • जो मुझे डसता है छूटते ही, 
  • उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ। 

  • जानती हूँ कोई साथ नहीं देता। 
  • क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ। 

  • कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ? 
  • ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ! 

  • पत्थर में भगवान बसते हैं, 
  • मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।




  • मरिचिका से भ्रमित होकर 
  • वो प्रश्न कर बैठे हैं 
  • थोडा पास आकर देखें 
  • जीवन बिल्कुल सपाट है 

  • अपने निष्टुर आंखों से 
  • जो आग उगलते रहते हैं 
  • उनपर बर्फ सा गिरता 
  • मेरा निश्छल अट्ठास है 

  • जीवन ने फल जो दिया 
  • वह अन्तकाल मे नीम हुआ 
  • उसे निगल भी मुस्काती 
  • हमारे रिश्ते की मिठास है 
  •  



  • जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ 
  • उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ 

  • कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे 
  • लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ 

  • ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर 
  • नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ 

  • जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...

  •  


  • तुम्हारी याद आते आते कहीं उलझ जाती है, 
  • जैसे चाँद बिल्डिंगों में अंटक गया हो कहीं, 
  • मेरे रास्ते तनहा तय होते हैं, 
  • सपाट रोड और उजाड़ आसमान के बीच. 
  • कुहासों की कुनकुनाहट, 
  • भौंकते कुत्ते सुनने नही देते. 
  • हवा गुम गई है. 
  • पत्थर जम गए हैं. 
  • रातें सर्द हैं. 
  • सिर्फ़ बर्फ हैं. 
  • अब तुम्हारे हथेलियों की गरमाहट कहाँ? 
  • जिससे उन्हें पिघलाऊँ? 
  • और बूँद-बूँद पी जाऊं! 
  • नशे मे, 
  • रंगीन रात की प्रत्यंचा पर तीर चढाऊँ, बौराऊँ ! 
  • अब तो 
  • सिर्फ़ बिंधा हुआ आँचल है, 
  • जिसकी छेद से जो दिखता है, 
  • वही गंतव्य है, दिशा है, 
  • मैं उसी ओर चलती हूँ, 
  • अंटके हुए चाँद को, 
  • कंक्रीटों में ढूँढती हूँ.



  • जो सुलगता है उसे चुपचाप बुझाना है, 
  • जिंदगी तेरे रंग मे रंग जाना है. 

  • गर पढ़कर कोई सहर का दिलासा दे, 
  • जला के हाथ लकीरों को मिटाना है. 

  • पोछ्ना है धुंधले क्वाबों की तस्वीर, 
  • कोरी सही, हकीकत से दीवार सजाना है. 

  • गर लड़ना हीं है तो खाली क्यों उतरें? 
  • अपनी तरकश को ज़ख्मों का खजाना है

  •  




  • तन परदेस, किन्तु आत्मा स्वदेश में है,
  • माता भारती का गुणगान तो करूंगा मैं,
  • पाप मुक्त देश बने इस पुण्य कार्य हेतु,
  • बाबाजी तुम्हारा सम्मान तो करूंगा मैं,
  • भावना से भावना के तार जुड़ते हैं सुना,
  • हृदय में हृदय का गान तो भरूँगा मैं,
  • चार जून को तुम्हारे साथ ही रहेगा मन,
  • व्रत उपवास तप ध्यान तो करूंगा मैं.

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