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  • § # उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये ।
  • #स्वामी विवेकानन्द
  • §  जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।
  • #-स्वामी विवेकानन्द
  • #§  तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।
  • @-स्वामी विवेकानन्द
  • §  ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो। 
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई #बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।
  • #-स्वामी विवेकानन्द
  • §  #हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।
  • -#स्वामी विवेकानन्द
  • §  मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  @पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।
  • -स्वामी विवेकानन्द

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  • §  सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए @चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  हे सखे, तुम क्योँ रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ! (वि.स. ६/८)
  • -स्वामी विवेकानन्द
  • §  बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो -- यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं -- इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।

  • Are great things ever done smoothly? Time, patience, and indomitable will must show.

  • Arise and awake, for the time is passing and all our energies will be: frittered away in vain talking. Arise and awake, let minor things, and quarrels over little details and fights over little doctrines be thrown aside, for here is the greatest of all works, here are the sinking millions.

  • All the powers in the universe are already ours. It is we who have put our hands before our eyes and cry that it is dark.

  • Be not afraid, for all great power throughout the history of humanity has been with the people. From out of their ranks have come all the greatest geniuses of the world, and history can only repeat itself. Be not afraid of anything. You will do marvellous work.

  • Calm and silent and steady work, and no newspaper humbug, no name-making, you must always remember.

  • Let people say whatever they like, stick to your own convictions, and rest assured, the world will be at your feet. They say, 'Have faith in this fellow or that fellow', but, I say, 'Have faith in yourself first'. that's the way.

  • Man never dies, nor is he ever born; bodies die, but he never dies.

  • Never think there is anything impossible for the soul. It is the greatest heresy to think so. If there is sin, this is the only sin ? to say that you are weak, or others are weak.

  • Take up one idea. Make that one idea your life — think of it, dream of it, live on that idea. Let the brain, muscles, nerves, every part of your body, be full of that idea, and just leave every other idea alone. This is the way to success, and this is the way great spiritual giants are produced.

  • "The earth is enjoyed by heroes"— this is the unfailing truth. Be a hero. Always say, "I have no fear".
  • There are many things to learn, he must struggle for new and higher things till we die — struggle is the end of human life. Shri Ramakrishna used to say, "As long as I live, so long do I learn." That man or that society which has nothing to learn is already in the jaws of death.

  • We are what our thoughts have made us; so take care about what you think. Words are secondary. Thoughts live; they travel far.

  • You will be nearer to Heaven through football than through the study of the Gita. These are bold words; but I have to say them, for I love you. I know where the shoe pinches. I have gained a little experience. You will understand the Gita better with your biceps, your muscles, a little stronger.
  • Arise, awake, sleep no more; within  each of you there is the power to remove all wants and all miseries.  Believe this, and that power will be manifested.Be brave and be sincere; then follow any path with devotion, and you must reach the Whole. Once lay hold of one link of the chain, and the whole chain must come by degrees.


  • Be free; hope for nothing from anyone. I am sure if you look back upon your lives you will find that you were always vainly trying to get help from others which never came.


  • Be not in despair; the way is very difficult, like walking on the edge of a razor; yet despair not, arise, awake, and find the ideal, the goal. 



  • Cowards only sin, brave men never, no, not even in mind.


  • Death is better than a vegetating ignorant life; it is better to die on the battle-field than to live a life of defeat.


  • Do not wait for anybody or anything. Do whatever you can. Build your hope on none.


  • Each work has to pass through these stages—ridicule, opposition, and then acceptance. Those who think ahead of their time are sure to be misunderstood.


  • Fear is death, fear is sin, fear is hell, fear is unrighteousness, fear is wrong life. All the negative thoughts and ideas that are in the world have proceeded from this evil spirit of fear.


  • Have faith in yourselves, and stand up on that faith and be strong; that is what we need.





















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